Essay on Nationalism- राष्ट्रवाद पर निबंध

राष्ट्रवाद पर निबंध

राष्ट्र और राष्ट्रवाद पूर्ण रूप से परस्पर सम्बद्ध विषय हैं. किसी विषेष भू-भाग पर रहने वाले ऐसे लोग राष्ट्र कहलाते हैं, जिनके सुख, दुख, आशा-विश्वास, रीति-रिवाज और परम्पराएं, उत्सव-त्यौहार और भाषा आदि सब-कुछ साझा हुआ करते हैं. इनके धार्मिक विचार और साम्प्रदायिक मान्यताएं अलग हो सकती हैं, परन्तु सभ्यता-संस्कृति की चेतना बड़ी सूक्ष्मता के साथ परस्पर जुड़ी हुई या फिर एक ही हुआ करती है.

वे सभी लोग उस भू-भाग या देष विशेष की धरती की मिटटी को मां के समान मानते हैं. वह उनके गर्व और गौरव का कारण हुआ करती है. इसी सबके नाम से उनकी राष्ट्रीयता और व्यक्त्वि के अस्तित्व की पहचान होती है. वस्तुतः देश के समान राष्ट्र का कोई प्रत्यक्ष या मूर्त रूप नही हुआ करता, वह तो भावात्मक ही होता है.

देश और राष्ट्र में क्या होता है अंतर?- nationalism meaning in hindi

देश और राष्ट्र में सूक्ष्म अन्तर रेखांकित किया जाता है. यद्यपि सामान्य स्तर पर दोनों एक मान लिये गये हैं. ‘राष्ट्र’ एक सूक्ष्म और व्यापक भावना का नाम है जो किसी विशेष भू-भाग पर बसे देश और उसके निवासियों की अनेकता में एकता बनाये रखने में समर्थ होती है लेकिन यह तब ही सम्भव होता है जब उस देश में रहने वाले राष्ट्र-जन जागरूक, समझदार, सहनशील और उदार हृदय वाले हों.

यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिये कि देश रहेगा, राष्ट्र रहेगा तथा हमारा अस्तित्व रह पायेगा और तभी हमारे धर्म, जाति और समाज के हित भी रह पायेंगे. उसके लिए भावना के स्तर पर एकता की भावना पहली एवं अनिवार्य शर्त है.

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यह भी एक स्मरणीय तथ्य है कि राष्ट्र की पहचान से ही व्यक्ति की राष्ट्रीयता जानी जाती है. जैसे हम भारत राष्ट्र के हैं तो हमारी राष्ट्रीयता भारतीय राष्ट्रीयता होगी. सबसे प्रथम हम राष्ट्रीयता के स्तर पर भारतीय हैं, हिन्दू-मुसलमान, सिक्ख-इसाई, जैन-बौद्ध या अन्य कुछ बाद में ही हैं. हमारा सबसे पहला धर्म है राष्ट्र और राष्ट्रवाद, उसके बाद ही कोई और धर्म हो सकता है. यही भाव किसी राष्ट्र उसकी राष्ट्रीयता को जीवित रख सकता है.

वस्तुतः राष्ट्र और राष्ट्रीयता एक उदात्त मानवीय सूझ, चेतना और मर्यादा का नाम हैः अतः राष्ट्रों के प्रति सहज मानवीयता, समानता और सहयोग का भाव बनाये रखकर उन सबको चिरजीवित रखा जा सकता है.

भारत और राष्ट्रवाद की भावना nationalism in india in hindi

हमारा देश भारत सभी स्तरों पर विविधताओं वाला देश है तथा प्रकृति ने ही इसे अनेक प्रकार की विविधताएं प्रदान की हैं. इस देश की भूमि पर कहीं तो मीलों तक मैदान है और कहीं घने जंगल, कही हरी भरी-भरी और बर्फानी पर्वतमालाएँ है तो कहीं लम्बे-लम्बे रेगिस्तान. कही पानी-ही-पानी है, हरियाली-ही-हरियाली है तो कही रूखा-सूखा वातावरण.

प्रकृति की इस विविधता के कारण ही यहां अनेक भाषाएं और बोलियां बोली, पढ़ी और लिखी जाती हैं. खान-पान, रहन-सहन, वेष-भूषा में विविधता और अनेकता. राष्ट्रीय पर्व, उत्सव-त्यौहार, व्रत-उपवास समान हैं, पर उनके मनाने के ढंग में स्थानीय तत्व अवश्य विद्यमान रहता है. इस प्रकार विविधता और अनेकता में व्यापक स्तर पर व्याप्त एकता का एकमात्र कारण यही है कि कुल मिलाकर हम अपने को भारत राष्ट्र का निवासी और राष्ट्रवाद को भारतीय कहने में गर्व व गौरव का अनुभव करते हैं. गौरव की यही अनुभूति सदियों बाद भी अस्तित्व का बनाये हुए है.

इतिहास साक्षी है कि जब कभी राष्ट्रवाद की यह भावना जिन किन्ही कारणों से खंडित हुई हैं. तभी हमें विदेशी आक्रमणों और अनेक प्रकार के कष्टों को झेलना पड़ता है. किन्तु जब भी राष्ट्रवाद की भावना हममें जागृत हुई, हम उन सभी कष्टों को झेलते हुए अपनी सभ्यता-संस्कृति और राष्ट्रीय आन को सुरक्षित रख सके.

अनेक कारणों से आज हमारी राष्ट्रीयता के सामने अपने अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है. भीतरी और बाहरी कई प्रकार की शक्तियां और अराजक तत्व हमारी एकता को खंडित कर राष्ट्रवाद को विभाजित कर देना चाहते हैं. भारत को उनसे पूरी तरह सावधान रहना है. ऐसे लोग धर्म की दुहाई देते हैं, जाति या वर्ग विशेष को अथव प्रांतीयता की संकीर्ण भावनाओं को दुलारने की चेष्टा करते हैं किन्तु इस प्रकार की किसी भी कुचेष्टा से यदि हम भटक जाते हैं तो राष्ट्र के खंडित होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है.

हमारी पवित्र और महान् राष्ट्रीयता, हमारी राष्ट्रीय मानवीयता और उससे प्राप्त ऊर्जस्विता की हमें हर कीमत पर रक्षा करनी है. अखंडता ही हमारी शक्ति है, हमारी आन और पहचान है.आज समस्त विष्व विघटनकारी प्रवृत्तियों के दौर से गुजर रहा है. निहित स्वार्थ-सीमा विस्तार के लिए भारत जैसे सभी विकासशील एवं विशाल देशों को विनष्ट कर देने तथा उन्हें पिछड़ा बन देने की ताक में लगे है. हमें अपनी सुदृढ़ राष्ट्रीय एकता की भावना बनाये रखते हुए ऐसी कूटनीतियों को उजागर करके कारगर उत्तर देना है.

राष्ट्र और राष्ट्रवाद दोनों ही बड़े पवित्र, गर्व गौरव वाले भाव हैं. हमें हर कीमत पर राष्ट्रीय एकता बनाये रखनी चाहिये क्योंकि यदि हमारा राष्ट्र रहता है तो हमारा धर्म, सम्प्रदाय, जाति, विश्वास और जीवन भी जीवित रह सकता है. यह सब जीवित रह सके, यह हम राष्ट्र-जनों के सुनियोजित आपसी व्यवहार व सूझ-बूझ ही निर्भर है.

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