Essay on Women’s Empowerment in Hindi महिला सशक्तिकरण पर निबंध

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

महिला सशक्तिकरण 19वीं शताब्दी के उन प्रमुख सामाजिक आंदोलनों में से एक है जिसने पूरी दुनिया को बहुत गहराई से प्रभावित किया है. यह आंदोलन महिलाओं को पुरूषों के समान ही अधिकार और दायित्व दिलवाने का वकालत करता है. इस आंदोलन की वजह से पूरी दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों में अपनी महिलाओं के लिए बेहतर जीवन और अधिकार सुनिश्चित करने का दबाव बनाया है. इस आंदोलन की बदौलत ही आज पूरी दुनिया में जेंडर इक्वालिटी के पक्ष में और लिंग विभेद के विरोध का वातावरण बना है.

महिला सशक्तिकरण का इतिहास

महिला अधिकारों को लेकर पुरातन समय से ही अलग-अलग स्वरूपों में आवाज उठती रही है. भारत में महाभारत काल में द्रोपदी, गांधारी और कुंती जैसी महिलाओं की कहानियां विद्यमान है. घोषा और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं का भी विवरण मिलता है जो अपने अधिकारों के प्रति सजग दिखाई देती है.

मध्यकालीन भारत में भी रजिया सुल्तान और लक्ष्मीबाई जैसे कई उदाहरण मिलते है. ये महिलायें अपने अधिकारों के लिए बहुत बहादुरी से लड़ी. इसके साथ ही पूरी दुनिया में महिलाओं द्वारा अपने अधिकारों के लिए समय-समय पर लड़ने की बात सामने आई है.

महिला अधिकारों के लिए सबसे सशक्त आवाज उस वक्त से सुनाई देने लगी जब महिला सशक्तिकरण एक सामाजिक विचार के साथ ही एक राजनीतिक विचार बन कर सामने आया. इस विचार को फेमिनिज्म का नाम दिया गया.

फेमिनिज्म शब्द का इतिहास

फेमिनिज्म शब्द के साथ एक रोचक बात यह जुड़ी हुई है कि इस शब्द का सबसे पहले प्रयोग किसी महिला ने बल्कि एक पुरूष चार्ल्स फोरियर ने किया था जो एक फ्रेंच दार्शनिक और समाजविद् था. उसने पहले पहल 1837 में अपने एक लेख में इस शब्द का प्रयोग किया. आक्सफोर्ड डिक्शनरी के 1852 के एडिशन में फेमिनिस्ट शब्द को पहली बार जोड़ा गया.

फेमिनिज्म आंदोलन का इतिहास

फेमिनिज्म शब्द से आज हम सब परिचित है और न्यूज माध्यमों से हम ढेरों ऐसी महिलाओं और पुरूषों को जानते हैं जो महिला अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं. इन कार्यकर्ताओं को फेमिनिस्ट के नाम से संबोधित किया जाता है.

ये लोग समान महिला अधिकारों से आगे बढ़कर पुरूषों को महिलाओं के प्रति सम्मान और समान की भावना विकसित करना चाहते है जो कानूनी होने के साथ ही सामाजिक परिवर्तन का भी वाहक बने. फे​मिनिज्म आंदोलन में जो की 19 वीं सदी में शुरू हुआ और आज तक चल रहा है को चार वेव्ज में बांटा गया है.

फर्स्ट वेव फेमिनिज्म

फेमिनिज्म आंदोलन अपने वर्तमान स्वरूप में 19वीं शताब्दी से आना शुरू हुआ. इस आंदोलन का प्रारंभिक उद्देश्य महिलाओं को समान वेतन, विवाह, परिवार और सम्पत्ति में समान अधिकार दिलाने पर केन्द्रित रहा. इस आंदोलन का ज्यादा असर तत्कालीन इंग्लैण्ड और अमेरिका पर अधिक रहा. इस आंदोलन के प्रभाव में पहली बार इंग्लैण्ड में कस्टडी आफ इन्फेंट एक्ट 1839 पारित हुआ जिसमें पहली बार महिलाओं को अपनी संतान पर हक प्राप्त हुआ. इसके बाद इंग्लैण्ड में ही मैरिड वूमन प्रोपर्टी एक्ट 1870 पारित हुआ जिसमें महिलाओं को पति की सम्पत्ति में अधिकार मिला. इन कानूनी अधिकारों की लड़ाई को फर्स्ट वेव फेमिनिज्म कहा गया.

सेकेण्ड वेव फेमिनिज्म

इसक बाद सेकण्ड वेव फेमिनिज्म सामने आया. इस बार महिलाओं ने सामाजिक अधिकारो के साथ ही राजनीतिक अधिकारो और अवसरों की मांग की. 20वीं सदी की शुरूआत में महिलाओं को वोट करने और प्रतिनिधित्व करने का अधिकार प्रदान नहीं किया गया था. उन्होंने मांग उठाई की उन्हें भी वोट करने और चुनाव लड़ने का अधिकार दिया जाये. इन आंदोलनकारियों को वूमन सफरेजिस्ट कहा गया. एमेलिन पंकहर्स्ट उस समय प्रमुख नाम बन कर उभरी जिन्हें टाइम पत्रिका ने 20वीं सदी के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान दिया. 1919 में अमेरिका में 19वें संविधान संशोधन द्वारा महिलाओं को वोट करने का अधिकार दे दिया गया. इसके बाद बारी-बारी से पूरी दुनिया में महिलाओं को वोट करने और चुनाव लड़ने का अधिकार दे दिया गया.

थर्ड वेव फेमिनिज्म

इसके बाद 1990 में थर्ड वेव फेमिनिज्म की बारी आई. फेमिनिज्म की इस धारा में अब अधिकारों की मांग में तल्खी आ गई थी और महिला अधिकार के लिए विद्रोही भाषा का उपयोग किया जाने लगा. थर्ड वेव फेमिनिज्म पुरूषों के प्रति अपनी नफरत को खुलेआम प्रदर्शित करने लगा. इस पीढ़ी की फेमिनिस्ट को अपनी तल्खी और पुरूष विरोधी बयानों की वजह से जाना जाने लगा.

फोर्थ वेव फेमिनिज्म

2012 में फोर्थ वेव फेमिनिज्म सामने आया. इस वेव में महिलाओं के लैंगिक अधिकारों, उनके यौन उत्पीड़न और यौन अत्याचारों पर खुलकर बात की जाने लगी. महिलाओं के लिए सुरक्षित समाज और कार्यस्थल का निर्माण करना इसका उद्देश्य था. इस वेव आफ फेमिनिज्म में मीटू जैसे आंदोलन मजबूत होकर सामने आये और महिलाओं के यौन उत्पीड़कों को सलाखों के पीछे जाने के लिए मजबूर होना पड़ा.

क्यो जरूरत पड़ी महिला सशक्तिकरण की?

मानव सभ्यता की शुरूआत में जब मनुष्य परिवार नाम की संस्था में शामिल हुआ तब जरूरत के मुताबिक महिला और पुरूष के काम का वितरण हुआ. संस्कृति के उद्भव के साथ ही पुरूषों द्वारा किये जाने वाले कामों को अधिक महत्व दिया जाने लगा और महिला को एक आब्जेक्ट की तरह उपयोग किया जाने लगा. बर्बर संस्कृतियों में तो महिलाओं को मुद्रा की तरह विनिमय का आधार भी बनाया गया. युद्ध में महिलाओं को बंटवारा किसी सामान की तरह किया जाने लगा. यौन दासी और बहुपत्नी प्रथा ने महिलाओं की स्थिति को बहुत ज्यादा खराब बना दिया.

क्या होती है पितृसत्तात्मक व्यवस्था?

इन सब चीजों ने मिलकर एक ऐसे समाज की स्थापना कर दी जिसमें पुरूषों का ही बोलबाला हो गया. ऐसे समाज को पुरूष प्रधान समाज की संज्ञा दी गई और ऐसी व्यवस्था में जिसमें पुरूष को परिवार का मुखिया माना गया, ऐसी व्यवस्था को पितृसत्तात्मक व्यवस्था कहा गया.

इस व्यवस्था ने महिला को घर की चारदीवारी में सीमित कर दिया और 16वीं शताब्दी से उसे शिक्षा से लेकर सम्पत्ति तक सभी अधिकारो से वंचित कर दिया गया. पहले उसे पिता के संरक्षण में रखा गया और विवाह के बाद उसे पति के संरक्षण में रहने के लिए तैयार किया गया. उसे पर्दे में रहने को मजबूर किया गया. आखिर में महिलाओं ने अपनी दुर्दशा के प्रति आवाज उठाई और सशक्तिकरण के माध्यम से समाज में अपनी बराबरी का हक पाने का आंदोलन किया.

महिला सशक्तिकरण आंदोलन के परिणाम

समय के साथ आज परिस्थितियां बदली है और महिला न सिर्फ अपने घर की चार दिवारी से निकली है बल्कि वह परिवार के मुखिया से लेकर देश की प्रमुख तक बन रही है. वह हर वह काम कर रही है जिसे अब तक पुरूष की बपौती माना जाता है. वह फाइटर प्लेन उड़ा रही है और युद्ध में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है.

महिला सशक्तिकरण के आंदोलन ने न सिर्फ उन्हें अपने अधिकार दिलवाये बल्कि उनकी जीवन शैली में भी सुधार किया है. यह आने वाला वक्त ही बतायेगा कि आखिर में कब जाकर महिलाओं को पूरी तरह उनके ​अधिकार मिलते है. अभी इस आंदोलन को लंबा रास्ता तय करना बाकी है.

यह भी पढ़ें:

0 Comments

Add Yours →

Leave a Reply