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मेंटल स्ट्रेस और डिप्रेशन से बचाव कैसे करें?

मेंटल स्ट्रेस और डिप्रेशन से बचाव कैसे करें?

मेंटल स्ट्रेस और डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों में पिछले तीन दशकों में लगातार बढ़ोतरी हुई। डब्ल्यूएचओ के अनुमान के मुताबिक प्रत्येक 8 में एक व्यक्ति मानसिक रोग का सामना कर रहा है। प्रत्येक सात में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारी से पीड़ित है। सरल शब्दों में कहें तो मानसिक सेहत में भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कुशलता शामिल है।

हम किस तरह सोचते हैं, कैसा महसूस करते हैं और किस तरह काम करते हैं, इन सभी प्रक्रियाओं का असर हमारी मानसिक सेहत पर आता है। तनाव का मुकाबला करने, दूसरों से जुड़ने और फैसले लेने में यही हमारी मदद करती है।

बचपन से लेकर उम्रदराज हाेने जीवन के हर हिस्से में मेंटल हेल्थ बेहद महत्वपूर्ण है। अगर आपका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है ताे इसका असर आपकी पूरी जिंदगी पर आता है। याद रखें सामान्य मेंटल हेल्थ और मेंटल डिसऑर्डर में अंतर होता है।

उदाहरण के तौर पर अगर लोगों के बीच बोलने से घबराते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप किसी मानसिक बीमारी के शिकार हैं। लेकिन जब आपके सोचने, महसूस करने बर्ताव का तरीका आपके कामों में रुकावट डालने लगे तो इसका अर्थ है कि आपकी मानसिक सेहत इससे प्रभावित हो रही है।

अगर आप अपने रिश्तों को नहीं संभाल पा रहे है, सोशल सेटअप में काम नहीं कर पा रहे हैं, पढ़ाई या जॉब में परफॉर्म नहीं कर पा रहे हैं, आपकी लर्निंग स्किल्स काफी घट गई हैं, लोगों के साथ बिल्कुल घुलमिल नहीं पा रहे हैं तो इसका मतलब है कि मानसिक परेशानी आपकी ओर बढ़ रही है।

तनाव जो कि मानसिक बीमारियों में प्रमुख है जीवन की आवश्यकताओं के प्रति एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है। हरेक मुश्किल परिस्थितियों के प्रति अलग ढंग से प्रतिक्रिया देता है। किसी मुश्किल परिस्थिति में तनाव होना सामान्य है लेकिन लगातार और अत्यधिक होना खतरनाक है। मानसिक बीमारियों में एंजाइटी डिसऑर्डर, मूड डिसआर्डर, शीजोफ्रेनिया डिसऑर्डर और कई प्रकार के फोबिया शामिल हैं। वैसे तो मानसिक सेहत का इतिहास काफी पुराना है।

लेकिन जब इसके बारे में लिखा जाने लगा तो 1896 में एमिल क्रेपलिन ने मानसिक रोगों का वर्गीकरण तैयार किया जिसने 80 सालों तक इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाए रखा। 19वीं सदी के मध्य में विलियम स्वीटर ने पहली बार मेंटल हाइजीन नामक शब्द गढ़ा।

यह सकारात्मक मानसिक सेहत को बढ़ाने से जुड़ा था। इसके बाद असंख्या शोध और अध्ययन इस क्षेत्र में हुए। हालांकि इस बात को नापने का कोई निर्धारित मापदंड नहीं है कि कोई व्यवहार विशेष सामान्य है या नहीं लेकिन अगर यह खतरनाक बन रहा है तो इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

वैसे तो मानसिक सेहत आज की घटना नहीं है सदियों से इस पर काम चल रहा है लेकिन कोविड महामारी ने हालात बदतर बना दिए। इसके चलते मानसिक बीमारियां जैसे चिंता, अवसाद, नशा, नींद से जुड़े रोग आदि बढ़ा दिए हैं।

बीएमजे में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार कोविड 19 संक्रमण ने दुनिया भर में 14.8 मिलियन मानसिक रोग बढ़ाए हैं। ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोध के मुताबिक कोविड से संक्रमित हो चुके मरीजों में मानसिक रोग होने की संभावना 25 प्रतिशत अधिक होती है।

महिलाओं या आईसीयू में एडमिट मरीजों में कोविड के बाद मानसिक रोगों से जुड़ी शिकायतें अधिक पाई गई। मानसिक रोगों में एंजाइटी डिसऑर्डर, डिप्रेसिव डिसऑर्डर, पोस्ट ट्रॉमाटिक डिसऑर्डर और दुख से जुड़े लक्षण पाए गए। इतना ही नहीं क्वालिटी ऑफ लाइफ भी घट गई थी। ऐसे में जरूरी है कि इन पर ध्यान दिया जाए।

मेंटल स्ट्रेस और डिप्रेशन: लक्षणों को कैसे पहचानें

– अगर किसी व्यक्ति के व्यवहार में बड़ा बदलाव दिखाई दे। उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति बार-बार रोने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए या उसकी भावनात्मक संवेदनशीलता बढ़ जाए इसका अर्थ है कि वह किसी मेंटल स्ट्रेस और डिप्रेशन की ओर बढ़ रहा है।

– यदि किसी सोने के पैटर्न में परिवर्तन दिखाई दे यानि वे लंबे समय या बहुत कम समय के लिए सो रहे हों या फिर उनकी नींद की गुणवत्ता या खाने की आदतों में बदलाव नजर आए यानि वे मेंटल डिसऑर्डर से परेशान हैं।

– अगर परिवार, दोस्तों के साथ उनका संवाद घट रहा हो उनकी पेशेवर या एकेडमिक परफॉर्मेंस कम हो रही हो तब भी किसी मानसिक रोग का शिकार हो रहे हैं।

– इन लक्षणों के पाए जाने पर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श की जरूरत पड़ती है।

तनाव के इलाज के लिए क्या कर सकते हैं?

पर्याप्त नींद लें। रोजाना सोने और उठने का एक ही समय रखें। छुट्‌टी के दिन भी इस शेड्यूल में अनुशासन का पालन करें। रात को देर तक न जागें और सुबह जल्दी उठें।

– नियमित रूप से फिजिकल एक्टिविटीज में हिस्सा लें। नियमित फिजिकल एक्टिवटी और व्यायाम फिक्र को घटाते हैं और मूड बेहतर बनाते हैं। कोई ऐसी एक्टिविटी करें जिसमें मूवमेंट होता हो उदाहरण के तौर पर डांस या स्पोर्ट्स। पार्क जाने की आदत विकसित करें।

– संतुलित और सेहतमंद भोजन खाएं। जंक फूड और रिफाइंड शुगर लेने से बचें। कैफीन का प्रयोग भी घटाएं, यह भी तनाव और चिंता को बढ़ाता है। नींद से जुड़ी दिक्कतें भी यह पैदा करता है।

– तंबाकु, शराब और ड्रग्स लेने से बचें। कोविड पहले ही फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों को बढ़ा चुका है एेसे में धुम्रपान करने वालों पर और अधिक खतरा है। तनाव कम करने के लिए एल्कोहल कहीं से भी मददगार नहीं है।

– स्क्रीन टाइम कम करें। हर दिन कुछ समय के लिए अपने इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बंद करें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले इनसे दूरी बनाएं। टीवी, फोन, लैपटाप पर बिताए जाने वाले समय में कटौती करें।

– रिलैक्स हों और खुद को रिचार्ज करें। अपने लिए वक्त निकालें। यहां तक कि कुछ समय एकदम शांत होकर बैठें और अपने मस्तिष्क को आराम दें। इससे चिंता में कमी आएगी। डीप ब्रीदिंग, ताई ची, योग जैसे अभ्यास भी मददगार हैं। संगीत सुनना, किताबें पढ़ना या जिस भी गतिविधि से आप रिलैक्स होते हैं उसमें हिस्सा लें। जो भी एक्टिविटी चुनें उसे नियमित रूप से करें।

– अपना रूटीन नियमित रखें। यह आपकी मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है। सोने, भोजन, काम और व्यायाम का समय निश्चित रखें। ड्रेसअप होने, खुद को फिट रखने के लिए भी प्रयास करें।

– नकारात्मक खबरों से दूरी बनाएं। सोशल मीडिया पर भी कम वक्त बिताएं।

– अपने आपको व्यस्त रखें। हेल्दी डिस्ट्रैक्शन आपको नकारात्मक सोच से दूर रखेंगे जो फिक्र और अवसाद को बढ़ाती है। अपनी किसी न किसी हॉबी के लिए वक्त जरूर निकालें – लिखना, पेंटिंग, खेलना या कुकिंग जो भी आपकाे पसंद हो, करें।

– अपने लिए कोई न कोई लक्ष्य या प्रोजेक्ट तय करें और उसे पूरा करने की स्ट्रैटजी भी बनाएं। पॉजिटिव टार्गेट पूरा करना आपकी मानसिक सेहत को फायदा पहुंचाएगा।

– सकारात्मक सोच पर फोकस करें। अपनी जिंदगी में घट रही सकारात्मक घटनाओं के बारे में सोचें। हर वक्त बुरी चीजों के बारे में सोचते रहना आपको कमजोर करेगा। हर दिन अपने जीवन की एक अच्छी चीज के लिए आभार व्यक्त करें। उम्मीद रखें। बदलावों को अपनाएं और समस्याओं को लेकर भी सकारात्मक रवैया अपनाएं।

– अगर आप अध्यात्म में रुचि रखते हैं तो इसकी मदद भी ले सकते हैं। आपके विश्वास से भी आपको ताकत मिलेगी। अनिश्चित समय में इससे आपको मदद मिलेगी।

– अपनी प्राथमिकताएं तय करें। एकदम से सब कुछ बदलने में न लग जाएं। लॉजिकल गोल्स सेट करें और धीरे-धीरे उन्हें पूरा करें। सफलता मिलने पर अपनी पीठ थपथपाएं। उपलब्धियां कितनी भी छोटी क्यों न हों, जश्न मनाना न भूलें।

– लोगों के साथ रिश्ते बनाएं। अपने आपको अलग-थलग न रखें। वर्चुअली भी सोशलाइज कर सकते हैं।

– दूसरों के लिए कुछ करें। अपने परिजनों के संपर्क में रहें। उनसे संवाद करते रहें और मिलते रहें। किसी परिजन को मदद की जरूरत हो तो पीछे न हटें।

– आपके बेहतरीन प्रयासों के बावजूद भी आप खुद को बेबस, उदास, गुस्सैल, चिंतित और डरा हुआ पा सकते हैं। मुश्किल कामों पर फोकस करने में भी आपको दिक्कत आ सकती है। इसके अलावा कई शारीरिक दिक्कतें भी हो सकती हैं लेकिन फिर भी आपको आत्म नियंत्रण नहीं खोना है। याद रखें आपको अपनी मदद खुद ही करनी होगी।

– अगर आप इन मुश्किल परिस्थितियों से गुजर रहे हों तो मदद लेने से कभी हिचके नहीं। जब कभी जरूरत हो तो अपने खास दोस्तों या प्रियजनों से बात करें। अपनी संवेदनाओं के बारे में बात करना मुश्किल होगा फिर भी आप ऐसा करें।

– अगर इससे मदद न मिले तो मनोवैज्ञानिक से संपर्क करें। इलाज में साइकोथैरेपी और दवाइयां दोनों शामिल होती हैं। बीमारी की गंभीरता के आधार पर एंटी एंजाइटी और एंटी डिप्रेसेंट्स दिए जाते हैं।

– जरूरत से ज्यादा सोना, खाना या सोचते रहना मेंटल स्ट्रेस और डिप्रेशन का लक्षण है, इससे बचने के लिए पर्याप्त नींद लें, दोस्तों से मिलें और खुश रहने की कोशिश करें।

डिस्क्लेमर: यह आलेख इंटरनेट पर मौजूद विभिन्न आलेखों और एक्सपर्ट्स की राय पर आधारित है। मेंटल स्ट्रेस और डिप्रेशन के सम्बन्ध में यह सिर्फ आरंभिक जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए है। इस सम्बन्ध में कोई भी कदम अपने डॉक्टर या एक्सपर्ट से पूछ कर ही उठाएं।

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