हेलन केलर – Helen Keller Biography in Hindi

हेलन केलर के जीवन के अनछुए पहलू- Life story of Helen Keller

हेलन केलर एक अद्भुत और विलक्षण महिला थीं, जिन्होंने अंधता और बधिरता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया और अपनी स्पर्श इंद्रिय को ही पढ़ने और समझने का माध्यम बनाया. शिक्षाविद, समाजवादी और समाजसेवी के रूप में विख्यात हुई हेलन केलर को 20वीं सदी की महानतम महिलाओं में शामिल किया जाता है.

संक्षिप्त जीवनी Brief Biography

हेलन केलर का जन्म 27 जून, 1880 को अमेरिका में एला के तुसकुम्बिया के एक सम्पन्न परिवार में हुआ. 1882 में एक गम्भीर बीमारी से उनकी आंखों की रोशनी और सुनने की क्षमता जाती रही.

1887 में एक शिक्षिका एनी  सुलिवान की मदद से हेलन केलर को अपनी कम्युनिकेशन की क्षमता सुधारने में काफी मदद मिली. इसके बाद, केलर ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और 1904 में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की.

1920 में केलर ने अमेरिकन सिविल लिबर्टी यूनियन (एसीएलयू ) की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया. हेलन केलर को उनके जीवनकाल में उनकी उपलब्धियों के लिए कई सम्मानों से नवाजा गया.

हेलन केलर का आरम्भिक जीवन – Early Life of Helen Keller

हेलन केलर अपने पिता आर्थर एच. केलर और मां कैथरीन एडम्स केलर की दोनों बेटियों में बड़ी थीं. उनके दो सौतेले भाई भी थे. बालिका हेलन के पिता सेना में अधिकारी थे.

परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी और आय का मुख्य स्रोत कपास की खेती थी. आगे चलकर, आर्थर एक अखबार नॉर्थ अलबामियन के संपादक बन गए. बालिका हेलन बहुत सुन्दर और आकर्षक थी.

छह माह की उम्र में ही उसने बोलना और एक वर्ष की उम्र में चलना सीख लिया था. डेढ़ वर्ष की आयु तक वह अन्य बच्चों की तरह देख व सुन सकती थी और कुछ-कुछ बोलना भी सीख रही थी.

हेलन की देखने और सुनने की क्षमता जाना – Helen’s loss of vision and hearing

हेलन एक गंभीर रोग (संभवतः मेनिन्जाइटिस या स्कारलेट फीवर)  से पीड़ित हुईं. बुखार आने के कुछ दिन बाद बालिका हेलन की मां ने महसूस किया कि जब खाने की घंटी बजती है या उसके चेहरे के सामने हाथ हिलाया जाए, तब हेलन कुछ प्रतिक्रिया नहीं देती.  बीमारी से 19 माह की अल्प आयु में ही हेलन केलर की देखने और सुनने की क्षमता चली गई.

हेलन का संघर्ष – Helen’s Struggle

हेलन शीघ्र ही समझ गई कि अन्य बच्चों से उसका जीवन भिन्न है. वह उनकी भांति देख-सुन व खेल नहीं सकती. यदि कोई उसके संकेतों को समझने में गलती करता तो वह क्रोध में उसके कपड़े फाड़ देती और बाल नोच लेती.

हेलन को अपनी गुड़िया से बहुत प्यार था. वह दिन भर उसे अपने गले से लगाए रहती थी. किन्तु वह अपनी छोटी बहिन को बहुत नापसंद करती थी, क्योंकि कोई भी उसे उससे खेलने नहीं देता था. एक दिन उसने अपनी छोटी बहिन को गुड़िया के पालने में सोते पाया.

वह चिढ़ गई और उसने क्रोध में पालना उलट दिया. मां ने भाग कर गिरती हुई बच्ची की रक्षा की. हेलन अक्सर दूसरों को ही नहीं, वरन अपने को भी हानि पहुंचाती थी. अपने शरीर पर दूध, पानी आदि गिरा लेती थी. एक दिन वह खुद जलते-जलते बच्ची.

हेलन की शिक्षिका एनी सुलिवान – Helen’s teacher Annie Sullivan

हेलन के माता-पिता हर तरह से हताश हो चुके थे. 1886 में हेलन की मां ने चार्ल्स डिकेन्स की ट्रेवल डायरी अमेरिकन नोट्स पढ़ी, जिसमें एक अंध-बधिर बालिका लॉरा ब्रिजमन की सफलापूर्वक शिक्षा का उल्लेख था.

जिसके बाद, उन्होंने हेलर और उसके पिता को बाल्टीमोर में डॉ. जे. जूलियन चिसोम के पास भेजा. डॉ. चिसोम ने उन्हें टेलीफोन के आविष्कारक एलेक्जेंडर ग्राहम बेल के पास भेजा, जो उन दिनों बधिर बच्चों के साथ काम कर रहे थे.

बेल ने हेलन और उसके माता-पिता से मुलाकात के बाद उन्हें बोस्टन नगर के पर्किन्स अंधविद्यालय जाने की सलाह दी. वहां उनकी भेंट एक शिक्षिका एनी सुलिवान से हुई.

एनी सुलिवान हेलन के अंधेरे जीवन में रोशनी की किरण सी बनकर आईं. सुलिवान स्वयं अत्यंत निर्धन थीं और 18 वर्ष की आयु में दृष्टिहीनता के रोग से पीड़ित हो चुकी थीं, किन्तु एक सफल ऑपरेशन से 20 वर्ष की आयु तक उनकी आंखों की रोशनी में काफी सुधार आ गया था.

एनी सुलिवान के स्नेह एवं सहानुभूति भरे व्यवहार ने हेलन के जीवन में चमत्कारिक बदलाव लाया. एनी ने हेलन की हथेली मे डॉल शब्द लिखा. हेलन को यह अच्छा लगा, हालांकि उस समय उसे यह पता नहीं था कि उसकी प्यारी गुड़िया को वास्तव में डॉल कहते हैं.

कुछ दिन के प्रयत्न से ही वह समझ गई कि प्रत्येक वस्तु का एक नाम होता है और धीरे-धीरे वह बहुत-से शब्द सीख गई. अब तक वह सदैव कुछ न कुछ नया ज्ञान, नई जानकारी चाहती और उसकी शिक्षिका एनी उसे सिखाते न थकती.

इस प्रकार एनी सुलिवान ने उसके लिए नया खजाना खोल दिया था.  ब्रेल लिपि( अंध लिपि) में लिखी हुई पुस्तकें वह हेलन को पढ़ने के लिए देती थीं.

हेलन केलर की शिक्षा – Helen Keller’s Education

एनी सुलिवान ने कितने कष्ट, परिश्रम और अध्यवसाय से हेलन को पढ़ाया, उसका वर्णन करना असम्भव है. कई बार उन्हें असफलता मिलती थी, तो भी वे धैर्य और साहस से प्रयत्न करती रहीं.

करीब 6 वर्ष की आयु में ही हेलन ने वस्तु-ज्ञान प्राप्त कर लिया था. 9 वर्ष की आयु में उसकी अटकी हुई जवान खुल गई और 10वें वर्ष में उसने सभी अक्षरों और बहुत से शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था.

वर्ष 1896 में हेलन ने एनी सुलिवान के साथ कैम्ब्रिज-स्कूल में प्रवेश किया. एनी क्लास में जरूरी नोट्स लेती थीं और अपनी संकेत भाषा में हेलन को समझाती थीं. दो वर्षो में ही हेलन ने अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, लैटिन आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था.

बीस वर्ष की आयु तक वे इतनी सुयोग्य हो चुकी थीं कि कॉलेज में प्रवेश कर सकें. वर्ष 1904 में उन्होंने विश्वविद्यालय की बी. ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की. उन्होंने शेक्सपीयर और अन्य महाकवियों का अध्ययन किया.

हेलन केलर का समाज सेवा करियर – Helen Keller’s career as a social worker

हेलन केलर ने अपने एक प्रोफेसर के प्रोत्साहन पर लिखना शुरू किया और सात पुस्तकें लिखी, जिनमें उनकी आत्मकथा The Story of My Life  अमूल्य निधि है. इस पुस्तक में हेलन केलर के बचपन से लेकर 21 वर्ष की उम्र में कॉलेज पहुंचने तक के सफर को लिखा गया है.

कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद हेलन केलर ने अपना पूरा समय समाज सेवा के लिए देना शुरू किया.  केलर जगह-जगह जाकर व्याख्यान देने लगीं और दूसरों के जीवन में बदलाव लाने का प्रयास करने लगीं.

1915 में उन्होंने विख्यात सिटी प्लानर जॉर्ज केसलर के साथ मिलकर अंधता और कुपोषण के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए समर्पित संस्था हेलन केलर इंटरनेशनल की स्थापना की.  1920 में उनके सहयोग से अमेरिकन सिविल लिबर्टी यूनियन की स्थापना हुई. केलर ने समाजवादी पार्टी में शामिल होकर समाजवाद के बारे में भी कई लेख लिखे.

यात्राएं Helen Keller’s Travels

1946 से 1957 के बीच हेलन केलर ने 5 महाद्वीपों के 35 से अधिक देशों की यात्रा की. 1955 में 75 वर्ष की आयु में अपने जीवन के सबसे लम्बे और कठिन सफर पर निकल पड़ीं. इसमें उन्होंने एशिया में 40 हजार मील की यात्रा 5 महीने में पूरी करते हुए अपने भाषणों औऱ मुलाकातों के माध्यम से लाखों लोगों को प्रेरणा दी.

1961 में हेलन केलर को एक के बाद एक कई स्ट्रोक आए और उन्होंने बाकी का अपना जीवन कनेक्टिकट स्थित अपने घर पर ही गुजारा.

हेलन केलर का निधन – Helen Keller’s death

हेलर केलर का उनके 88वें जन्मदिन से कुछ सप्ताह पहले 1 जून, 1968 को निधन हो गया. हेलन केलर ने संकल्प, कड़ी मेहनत और अपनी कल्पनाशीलता से अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बना लिया और पूरी दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया.

हेलन केलर से जुड़े रोचक तथ्य – Interesting facts about Helen Keller

हेलन केलर तैरना, घुड़सवारी करना और नाव खेना भी जानती थीं. वे शतरंज और ताश भी कभी-कभी खेलती थीं. वे  ब्रेल-लिपि में बनाए टाइपर-राइटर द्वारा लेख, पुस्तकें आदि लिखती थीं.

हेलन केलर की स्पर्श इंद्रिय इतनी संवदनशील थीं कि गाने वाले के कण्ठ को छूकर ही वे सुरीले गीत का आनंद ले लेती थीं. रेडियो को छूकर उसके कम्पन से ही सब कुछ सुनती थीं. हेलन हाथ मिलाते ही परिचितों को पहचान लेती थीं और यह भी बता सकती थीं कि वे इस समय क्रोध में हैं अथवा आनन्द में.

हेलन केलर को मिले पुरस्कार एवं सम्मान – Awards and honours received by Helen Keller

  • 1936 में थियोडोर रूजवेल्ट विशिष्ट सेवा पदक
  • 1964 में राष्ट्रपति स्वतंत्रता पदक
  • 1965 में वीमन हॉल ऑफ फेम में चुना गया
  • स्कॉटलैंड की ग्लासगो यूनिवर्सिटी, जर्मनी की बर्लिन यूनिवर्सिटी और भारत के दिल्ली विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि
  • एजूकेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्कॉटलैंड की मानद फैलो

हेलन केलर के कथन- Helen Keller quotes

” मैंने समाचार-पत्रों से सबसे पहले जाना कि मैं अन्धी, बहरी और गूंगी थी. मैंने प्रयत्न और परिश्रम से अपने को शिक्षित बनाया. अब मैं पढ़ सकती हूं, बोल सकती हूं, रंगों में भेद बता सकती हूं, टेलीफोन के संदेशों को सुन सकती हूं. मुझमें दैवी शक्ति है. मैं कभी दुखी, चिन्तित और निराश नहीं होती तथा सदैव प्रसन्न और संतुष्ट रहती हूं.’’


‘‘अनन्त काल क्षेत्र में, चिरन्तन, दिव्य, रहस्यमयी शक्तियों के प्रति कौन अन्धा और बहरा नहीं है. मैं अन्तर्दृष्टि से परम प्रभु की अनन्त विभूतियों का दर्शन करती हूं और उसके अमर संगीत को सुनती और अनुभव करती हूं.’’


‘‘यह सत्य है कि मैं वृक्षों के झुरमुट में से झांकते हुए चन्द्रमा को नहीं देख सकती, किन्तु मेरी उंगलियाँ जल की हिलोरों में अठखेलियां करती हुई चांदनी की झलमलाहट को स्पर्श करती हुई-सी प्रतीत होती हैं.’’


‘‘मृत्यु के पश्चात ही मुझे वास्तविक दृष्टि-लाभ होगा, अतएव चिरन्तन सत्य के दर्शन करने में मैं तब तक तत्पर रहूंगी जब तक कि मुझमें इतनी अंतश्चेतना जागृत न होगी कि जीवन और मृत्यु समान हैं.’’

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