prayagraj allahabad history, tourist places and name change in hindi – प्रयागराज इलाहाबाद का इतिहास, दर्शनीय स्थल और धार्मिक महत्व

प्रयागराज इलाहाबाद का इतिहास, दर्शनीय स्थल और धार्मिक महत्व

इलाहाबाद जिले का नाम बदलकर प्रयागराज allahabad name change to prayagraj कर ​दिया गया है. इसी के साथ इस प्राचीन भारतीय तीर्थ को अपनी पहचान एक बार फिर वापस मिल गई. प्रयागराज एक ऐतिहासिक नगर है जो पुरातन काल से ही अपने वैभव और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता रहा है. हिन्दु महाकाव्यों और पुराणों में इसका वर्णन मिलता है. कई संस्कृत स्मृतियों और ऐतिहासिक रचनाओं में भी प्रयागराज की प्रशंसा पढ़ने को मिलती है. यहां हम प्रयागराज के इलाहाबाद बनने और इलाहाबाद के एक बा​र फिर प्रयागराज बनने के इतिहास को बताने का प्रयास कर रहे हैं.

 

प्रयागराज शब्द का अर्थ-Prayagraj meaning

प्रयाग में गंगा और जमुना एक-दूसरे से मिलती हैं. पुराने समय में बहुत से ज्ञानी-ध्यानी ऋषि लोग यहां आकर अपना-अपना आश्रम बनाकर रहने लगे. इस तरह धीरे-धीरे यह जगह ऋषि-मुनियों और साधु-महात्माओं का केन्द्र बन गई. इसका नाम दूर-दूर तक फैलने लगा और लोग इन महात्माओं का उपदेश सुनने को यहां आने लगे. इसलिए यह स्थान ‘तीर्थराज’ यानी ‘तीर्थों का राजा’ कहलाया जाने लगा. ‘प्रयाग’ का मतलब है ‘प्र’ यानी प्रकृष्ट यानी सबसे अच्छा या बहुत और ‘याग’ यानी यज्ञ. जहां पर बहुत से या सबसे अच्छे यज्ञ हुए हो, उसको प्रयाग कहते है.

प्रयागराज का पुराणों में विवरण-Prayagraj Religious importance 

प्रयाग राज के बारे में रामायण में लिखा है कि वनवास को जाते समय राम अयोध्या से चलकर श्रृंगपेरपुर आये. यहां उन्होंने केवट से नाव मंगाकर गंगा को पार किया. श्रृंगपेरपुर से चलकर वे प्रयाग पहुंचे. प्रयाग के पास आने पर उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण से कहा, “हे लक्ष्मण, देखो, यही प्रयाग है, क्योंकि यहां मुनियों का वास है, अब हम गंगा और जमुना के संगम के पास आ गए, क्योंकि दोनों नदियों के जल के मिलने का कल-कल शब्द सुनाई पड़ रहा है.
तुलसीदास ने प्रयाग के बारे में लिखते हुए ‘रामायण’ में राम से कहलवाया है-
चार पदारथ भरा भंडारू।
 
पुन्य प्रदेश देस अति चारू।।
प्रयाग में राम में भारद्वाज मुनि के आश्रम में आराम किया था. आज भी प्रयाग में कर्नलगंज मुहल्ले में भारद्वाज के नाम से एक स्थान मौजूद है. यहां कई मंदिर बने हुए है और उनमें बहुत से ऋषि-मुनियों और देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी हुई है. महाकवि कालिदास में ‘रघुवंश’ में प्रयाग का नाम तो नहीं लिया, पर गंगा और जमुना के मिलने का बड़ा प्यारा बखान किया है. राम सीताजी से कहते है,“देखो, यमुना की सांवली लहरों से मिली हुई उजली लहरोंवाली गंगाजी कैसी सुन्दर लग रही हैं. जो गंगा-जमुना के संगम में नहाते हैं ये ज्ञानी न हों तो भी संसार से पार हो जाते हैं.

प्रयागराज का इतिहास- Prayagraj history

रामायण के बाद प्रयाग के बारे में इतिहास में कोई खास बात नहीं आती. बुद्ध ने यहां कुछ दिन ठहरकर लोगों को उपदेश दिया. प्रयाग से कुछ मील दूर पर एक जगह है कोसम. वहां एक बहुत पुराने नगर कौशाम्बी के खण्डर खोदकर निकाले गए है. किसी जमाने में यह नगर बहुत प्रसिद्ध था. यहां के राजा उद्दयन और उनकी रानी बाह्यवद्धता की कहानी बड़ी मनोरंजक है. कहा जाता है कि वहां गौतमबुद्ध दो बरस तक रहे हैं. बौद्धधर्म का वहां एक बड़ा विहार था. चंदन की बनी बुद्ध की एक विशाल मूर्ति भी यहां थी, जिसे राज उदयन ने बनवाया था. एक कुंए और स्नानघर का भी पता चला है. बुद्ध भगवान वहां स्नान किया करते थे. 
महाराज हर्ष के समय में आने वाले चीनी यात्री ह्नेनसांग के समय तक इस कुंए में जल भरा रहता था. वहां के एक स्तूप में महात्मा बुद्ध के केश और नाखून पड़े हुए थे. सम्राट अशोक राजा होने से पहले कौशाम्बी मे रहा था. सम्राट होने पर उसने वहां एक लाट बनवाई. इस लाट पर उसने अपनी प्रजा के लिए अच्छी-अच्छी बाते खुदवाई. इलाहाबाद के किले में अशोक की जो लाट है वह कौशाम्बी से ही आई थी.

प्रयागराज का कुंभ मेला- Prayagraj Kumbh Mela

प्रयाग में हर साल माघ के महीने में संगम पर मेला लगता है. बारहवें साल कुंभ के अवसर पर तो तीस-पैंतीस लाख यात्री इकट्ठे हो जाते हैं. हर छठे साल अर्ध-कुंभी का मेला लगता है. इस मौके पर भी काफी भीड़ इकट्ठी हो जाती है. प्रयाग के ये मेले बड़े पुराने हैं. 
कुंभ के बारे में एक कथा है. कहते है, जब देवताओं और राक्षसों में अमृत के लिए झगड़ा हुआ और समुद्र मथा गया तो अमृत का घड़ा लिये धनवन्तरि समुद्र से निकले. उन्होंने यह घड़ा देवताओं को दे दिया. देवता उसे किसी साफ जगह में रखकर पान करना चाह रहे थे कि इसी बीच दैत्य उसको उठा ले जाने को तैयार हुए. देव चाहते थे कि अमृत पीकर वे अमर हो जाये. दैत्य चाहते थे कि वे पीये. दैत्य ज्यादा ताकतवाले थे. उधर भगवान ने सोचा कि अगर दैत्योें ने अमृत पी लिया तो बड़ा बुरा होगा तो वह मोहनी का रूप धरकर वहां पहुंचे और देवों और दैत्यों को अपने रूप से चकित कर उनका लड़ना-झगड़ना बंद कर दिया.
यही नहीं, उन्होंने दोनों के बीच समझौता कराने की भी जिम्मेदारी भी ली. मोहनी के रूप के बस में हो कर दैत्यों ने उनकी शर्त मान ली. मोहनी ने अमृत का घड़ा इन्द्र के बेटे जयंत को सौंपा और उसकी रखवाली का काम सूर्य, चंद्र, गृहस्वामी और शनि के हाथ में दिया. चंद्रमा को जिम्मेदारी दी कि अमृत गिरने न पाये, बृहस्पति को देखना था कि कहीं राक्षस उसे न उड़ा लें, अकेले देवता उसे न हड़प लें, यह जिम्मेदारी रही शनि की. रहें सूर्य, उनका काम यह देखना था कि घड़ा फूटने न पावे. इसी समय देवताओं के इशारे से जयंत अमृत का घड़ा लेकर भागा. राक्षसों ने उसका पीछा किया. भागते समय जयंत को चार जगह घड़ा रखना पड़ा. उसे रखते तथा उठाते समय इन चारों जगहों पर अमृत की बूंदें गिरी. इसी से वहां कुंभ-पर्व मनाया गया और आज भी मनाया जाता है. ये चार जगहें है- प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन.
कुंभ के मेले में देश के कोने-कोने से आदमी आते हैं. साधु-संन्यासियों का भी बड़ा जमघट रहता है. उनके अखाड़े बड़ी धूम-धाम और गाजे-बाजे के साथ निकलते है. एक पुरानी कहावत है-“तीर्थ गए मुड़ाए सिद्ध” प्रयाग में जितने यात्री आते है, उनमें से बहुत से अपने सिर के बाल मुड़ा आते है. सधवा स्त्रियां अपना पूरा मुंडन नहीं कराती. वे अपने थोड़े से बाल कैंची से कटवाकर त्रिवेणी में बहा देती हैं. त्रिवेणी पर लोग तरह-तरह के दान करते हैं इनमें से एक दान है वेणीदान. इस दान को देनेवाले लोग अपनी स्त्री को दान कर देते हैं. बाद में कुछ धन देकर उसे ले लेते हैं. दक्षिण भारत से आये हुए यात्री इस तरह का दान बहुत करते हैं.

प्रयागराज ह्नेनसांग और हर्षवर्धन का सम्बन्ध

आज से कोई साढ़े बारह सौ साल पहले हर्षवर्धन नाम का एक बड़ा राजा राज्य करता था. उसकी राजधानी कन्नौज में थी. उसके समय में चीन से ह्नेनसांग नामक यात्री भारत में आया था. इस यात्री को हर्ष ने बड़े आदर के साथ अपनी राजधानी में बुलाया था. हर्ष हर पांच साल प्रयाग में त्रिवेणी के संगम पर ‘महामोक्ष परिषद्’ के नाम से एक सभा किया करता था. जब ह्नेनसांग भारत में था तो इस तरह की छठवीं सभा हुई. इस सभा में ह्नेनसांग भी शामिल हुआ था. ह्नेनसांग ने इस सभा का हाल विस्तार से लिखा है. उससे पता चलता है कि इस सभा में शामिल होने के लिए भारत के अनेक राजा इकट्ठे हुए थे. महाराज हर्ष ने त्रिवेणी पर अपने खजाने का सारा धन पुजारियों, विधवाओं, अनाथों और दीन-दुखियों को दान कर दिया. जब कुछ न रह गया तो उसने अपना रत्नों से जड़ा हुआ राजमुकुट और मोतियों का हार भी उतारकर दे दिया, यहां तक पहनने के कीमती कपड़े भी दान कर डाले. ऐसा महादान महाराज हर्ष बड़ी खुशी से हर पांचवे साल प्रयाग में किया करते थे. 

प्रयाग का नाम कैसे पड़ा इलाहाबाद?

प्रयाग का नाम इलाहाबाद होना भी एक ऐतिहासिक तथ्य है. इसका यह नाम अकबर बादशाह के जमाने में पड़ा. उसने पहले इसका नाम अल्लाहाबाद रखा था, जो बाद में धीरे-धीरे इलाहाबाद हो गया. अकबर बादशाह अपने एक विद्रोही सरदार को दबाने के लिए प्रयाग के पास एक जगह आया. लौटते समय वह प्रयाग भी पहुंचा. गंगा और जमुना के बीच की जगह को देखकर उसका मन हुआ कि यहां अपने रहने के लिए एक किला बनवाए. यही उसने किया. 

प्रयागराज इलाहाबाद के दर्शनीय स्थल

इलाहाबाद का किला – इलाहाबाद किला हिस्ट्री इन हिंदी

इलाहाबाद का किला किसने बनवाया था, अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है. अकबर ने इलाहाबाद का ​किला बनवाया. यह किला गंगा-जमुना के बीच की भूमि पर लाल पत्थर का बना हुआ है. एक दीवार जमुना के किनारे है और दूसरी गंगा के सामने. इस तरह किले की रक्षा करने का काम दोनों नदियां करती है. किले के चार हिस्से थे. पहला, बादशाह के रहने के लिए था, जिसमें 12 बगीचे थे. दूसरा बेगमों और शाहजादों के लिए था. इस किले में एक ऊंची जगह पर बादशाह का झरोखा था, जहां से वह हाथियों और जंगली जानवरों की लड़ाइयां देखा करता था. यमुना की ओर के महलों में कई बड़े-बड़े दीवान खाने थे, जिनमें बैठकर बादशाह अपनी बेगमों के साथ गंगा और जमुना के नजारे देखा करता था. यह किला अपने ढंग का बेजोड़ था. बाद में अंग्रेजी राज्य के दिनों में इसमें कुछ हेर-फेर हो गया. अंग्रेजी राज्य के जमाने में किले में लड़ाई का सामान रखा जाने लगा. 

त्रिवेणी का संगम-Triveni Sangam

अगर संगम न होता तो इस जगह का तीन-चौथाई महत्व कम हो जाता. गंगा, जमुना और सरस्वती, ये तीन नदियां इस जगह पर मिलती है. इनमें से दो तो अब भी है. तीसरी के बारें में लोगों की अलग-अलग मान्यताएं हैं. हो सकता है, सरस्वती नाम की कोई तीसरी धारा भी कभी बहती हो, लेकिन अब वह दिखाई नहीं देती. कहा जाता है कि यहां पहले जमुना ही बहती थी. गंगा तो बाद में आई गंगा के आने पर जमुना अर्ध्य लेकन आगे आई, लेकिन गंगा ने उसे स्वीकार न किया। जमुना ने पूछा,“क्यों बहन, स्वीकार क्यों नहीं करती?” गंगा ने उत्तर दिया, “इसलिए कि तुम मुझ से बड़ी हो. मैं तुम्हारा अर्ध्य ले लूंगी तो आगे मेरा ही नाम ही मिट जाएगा। मैं तुममें समा जाऊंगी. यह सुनकर जमुना बोली, “बहन, तुम इसकी चिंता न करो. तुम मेरे घर मेहमान बनकर आई हो. मेरा यह अर्ध्य स्वीकार कर लो. मैं ही तुममें लीन हो जाऊंगी. चार सौ कोस तक तुम्हारा ही नाम चलेगा. फिर मैं तुमसे अलग हो जाऊंगी.” गंगा ने यह बात मान ली. इस तरह गंगा और जमुना एक-दूसरे से गले मिले. गंगा और यमुना के बारे में और भी कई कथाएं कही जाती हैं. 
संगम पर लोग नाव में बैठकर गंगा-यमुना की धाराओं के मिलन को देखते है. गंगा का जल सफेद, जमुना का नीला. दोनो रंग अलग-अलग दिखाई देते हैं. संगम से आगे गंगा का जल भी कुछ नीला हो जाता है. कहते है, संगमसे आगे नाम गंगा का रह जाता है और रंग यमुना का. हिमालय की पुत्री होने के कारण गंगा का जल शीतल है, सूर्य की कन्या माने जाने के कारण यमुना का गरम. जाड़ो में स्नान करने पर इस बात की सच्चाई साफ मालूम हो जाती है. संगम पर रोज यात्रियों की भीड़ रहती है. एक छोटा-मोटा मेला तो यहां बारहों महीने लगा रहता है. पंडो की झोंपड़ियां बनी है, जिन पर अलग-अलग झंडे फहराते हैं. 

प्रयागराज मे अस्थि विसर्जन

संगम पर बहुत-से लोग अपने मरे हुए संबंधियों की राख और अस्थियां बहाने आते हैं. महात्मा गांधी की अस्थियां भी इसी स्थान पर प्रवाहित की गई थी. इस प्रकार आदिकाल से लेकर अबतक गंगा हमारे देश की न मालूम कितनी विभूतियों की राख और अस्थियों को बहाकर ले गई है और उन्हें सागर को अर्पण कर दिया है. 

इलाहाबाद का खुसरो बाग-Khusro Bagh

संगम तीर्थ और इलाहाबाद के किले के अलावा भी प्रयागराज में कई दर्शनीय स्थल और ऐतिहासिक मंदिर हैं. प्रयागराज में घूमने लायक अच्छी जगह खुसरो बाग है. यह बाग चौकोर है. उसके चारों तरफ ऊंची-ऊंची पत्थर की दीवारें है. उत्तर और दक्षिण की ओर को दो बड़े फाटक है. बाग के बीच में थोड़े-थोड़े फासले पर चार बड़ी इमारते हैं. पूरब की तरफ के भवन में शाहजादा खुसरो की कब्र है. खुसरो जहांगीर का बेटा था. बुरहानपुर में उसका कत्ल करा दिया गया था. 
बात यों हुई कि खुसरो अपने पिता जहांगीर से बागी होकर आगरे से लाहौर चला गया था. वहां जाकर उसने अपने पिता से लड़ाई ठान ली. पर जहांगीर की सेना के मुकाबले उसकी हार हुई और वह पकड़ा गया. बागी होने के कसूर में उसकी आंखों की पलको को सिलवा दिया गया. बाद में जहांगीर को इस बात का बड़ा पछतावा हुआ. खुसरो अपने दूसरे भाई खुर्रम की निगरानी में बुरहानपुर के किले में कैद था. यही खुर्रम शाहजहां के नाम से जहांगीर के बाद बादशाह हुआ. जब खुर्रम ने देखा कि जहांगीर को खुसरो पर दया आने लगी तो उसको डर होने लगा कि कहीं जहांगीर अपने मरने के बाद खुसरो को ही बादशह न बना डाले. इसलिए उसने खुसरो की हत्या करवा दी और जहांगीर के पास खबर भिजवा दी कि पेट के दर्द से वह मर गया. 
खुसरो की लाश पहले बुरहानपुर में दफनाई गई फिर जहांगीर के हुक्म से आगरे लाई गई. वहां लोग उसकी कब्र को पूजने लगे. यह बात नूरजंहा को सहन न हुई. सौतेली मां होने के कारण वह खुसरो को फुटी आंख भी नहीं देख सकती थी. सो उसने जहांगीर से कह-सुनकर खुसरों की लाश को आगरे से फिर खुदवाकर इलाहाबाद भिजवा दिया. यहां वह इसी बाग में दफन किया गया. खुसरों की कब्र एक महराबदार छत के नीचे है. देखने में सुन्दर है. जिस भवन में खुसरों की कब्र है, उसके अन्दर फारसी में बारह शेर लिखे हुए है. खुसरों बाग में दो और कब्रें है. एक उसकी मां की और दूसरी उसकी बहन की. 
अफीम खाने के कारण खुसरो की मां शाह बेगम की मौत हुई थी. बहन सुल्तानुन्निसा ने अपनी जिन्दगी में ही अपनी कब्र बनवाई थी. बाद में उसकी राय बदल गई. वह कब्र खाली पड़ी है. सुल्तानुन्निसा मरने के बाद सिकंदरा में अकबर की कब्र के पास दफनाई गई. खुसरो बाग के पास ही खुल्दाबाद की सराय है. इसे बादशाह जहांगीर ने बनवाया था. प्रयाग के दारागंज मुहल्ले का शाहजहां के सबसे बड़े बेटे दाराशिकोह ने बसाया था. उसी के नाम पर मुहल्ले का नाम दारागंज पड़ा. 

अंग्रेजी राज में हुई इलाहाबाद की संधि

अंग्रेजी राज्य के शुरू के दिनों में दिल्ली के मुगल बादशाह शाह आलम और अंग्रेजों के बीच प्रयाग में एक बड़ी महत्वपूर्ण संधि हुई थी. अंग्रेजों की ओर से क्लाइव इस संधि की शर्तों को तय करने आया था. इस संधि के अनुसार अंग्रेजों को शाह आलम ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के प्रांतो की मालगुजारी वसूल करने का हक दे दिया. इस तरह अंग्रेजी राज्य की नींव एक तरह प्रयाग में पड़ी.

प्रयागराज का नेहरू परिवार

पंड़ित जवाहरलाल और उनके पिता पंडित मोतीलाल नेहरू देश को प्रयाग से ही मिले. कर्नलगंज में नेहरू परिवार का अपना मकान है. इसे ‘आनंद भवन’ कहते हैं. आनंद-भवन को पंडित मोतीलाल ने बनवाया था. आनंद भवन के पास ही उनका बनवाया एक और विशाल भवन है जो उन्होंने बाद में कांग्रेस को दान कर दिया. तब से उस का नाम ‘स्वराज्य-भवन’ पड़ा. इसमें बहुत दिनों तक कांग्रेस का दफ्तर रहा. इस भवन में पत्थर और धातु की अनेक मूर्तियां है. कौशाम्बी से मिली बहुत सी वस्तुएं भी यही रखी हैं. पुराने जमाने के सिक्के भी हैं. 
यहां हाथ की लिखी हुई पुस्तकों और चित्रों का भी अच्छा संग्रह है. अजायबघर के एक कमरे का नाम है जवाहरलाल नेहरू भवन. इसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू की चीजें रखी हुई हैं. जैसे चरखे और खादी व रेशम आदि के कपड़े. पंडित जवाहरलाल नेहरू की दी हुई चीजों में एक चीज बड़ी अनमोल है, वह है उनके जीवन-चरित की उनके अपने हाथ की लिखी कापी. इसे उन्होंने जेल में लिखा था और लंदन से छपी थी. 

प्रयागराज के मंदिर Famous Temples of Prayagraj

पातालपुरी या अक्षयपट का मंदिर

तीर्थराज होने के कारण प्रयाग में मंदिर भी बहुत-से है. पातालपुरी या अक्षयपट का मंदिर इनमें बहुत प्रसिद्ध है. यह मंदिर त्रिवेणी के पास ही बना है. किले के एक फाटक से होकर इसमें आने का रास्ता है. इस मंदिर की छत खंभों पर टिकी है. मंदिर में घूमते समय ऐसा जान पड़ता हैं, मानो किसी तहखाने या सुरंग में घूम रहे हों. शायद इसीलिए इसे लोग ‘पातालपुरी का मंदिर’ कहते हैं. यहां अनेक हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां है. धर्मराज, अन्नपूर्णा, विष्णु, लक्ष्मी, कुबेर, शंकर, सरस्वती आदि सब मिलाकर 46 मूर्तियां है. कुछ ऋषि-मुनियों की है, जिनमें दुर्वासा, मार्कंडेय और वेदव्यास हैं. इनमें से कुछ मूर्तियां तो बड़ी ही सुंदर हैं. 

अक्षयवट

इन मंदिरो की सबसे मुख्य चीज अक्षयवट है. उतर की दीवार में एक बड़ा आला बना है. उसमें पुरानी लकड़ी का एक छोटा गोल टुकड़ा रखा हुआ है, जिस पर कुछ कपड़ा लिपटा रहता है. यही अक्षयवट बताया जाता है. यात्री लोग इसका पूजन करते है और इस पर सूत लपेटते हैं. हिन्दुओं का विश्वास है कि अक्षयवट प्रलय में भी नष्ट नहीं होता. प्रलय के समय इसी अक्षयवट पर भगवान छोटे बच्चे का रूप धरकर अपने पैर के अंगूठे को मुंह में देकर क्रीड़ा करते हैं. ह्नेनसांग नामक चीनी यात्री ने भी अक्षयवट के बारे में लिखा है. इससे पता चलता है कि इस समय यह वृक्ष मंदिर के आंगन में खड़ा था. उसकी पत्तियां और शाखाएं दूर-दूर तक फैली हुई थी. उन दिनों लोगों का विश्वास था कि जो भी आदमी इस पेड़ से गिरकर जान देगा, वह सेवा के लिए स्वर्ग चला जायेगा. 

हनुमान मंदिर

इलाहाबाद को अपने विशालकाय हनुमान मंदिर की मूर्ति के लिए भी जाना जाता है. यह मंदिर बिल्कुल संगम के नजदीक बना हुआ है और संगम के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं को यह दूर से ही दिखाई देने लगता है. यह मंदिर बरसात के दौरान नदी में डूब जाता है. उस समय यहां पूजा का काम भी बंद कर दिया जाता है.

शंकर विमान मंडपम

शंक विमान मंडपम प्रयागराज के प्राचीन मंदिरों में से एक है. यहां कामाक्षी देवी, 51 शक्तिपीठ, शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट की मूर्तियां देखने को मिलती हैं. यहां का सबसे बड़ा आकर्षण योगसहस्त्र या सहस्त्रयोगा लिंंगा की 108 मूर्तियां है, इन्हीं की वजह से इस मंदिर को अपना नाम मिला है. चार स्तम्भों पर टिका यह मंदिर 130 फुट ऊंचा है.

इलाहाबाद का प्रतिष्ठानपुर थी प्रमुख राजवंशों की राजधानी

गंगा के उस पार झूसी हैं, जो पुराने जमाने में प्रतिष्ठानपुर के रूप में अपनी निराली शान रखती थी. आज भले ही उसकी यह प्रतिष्ठा न हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि एक समय उसकी यश-पताका सारे देश में फैली थी. चन्द्रवंश के प्रतापी नरेश पुरुरवा और नहुप, ययाति और पुरु, दुष्यंत और भरत सभी में इसी प्रतिष्ठानुसार को अपनी राजधानी बनाया था और यहीं से अपना राज-काज चलाया था. 

पांडवों के लिए इलाहाबाद में ही बनाया गया था लाक्षागृह

प्रयाग से चौबीस मील पर हंडिया नामक स्टेशन से तीन मील दक्खिन की ओर एक और पुरानी जगह है. यहां गंगा के किनारे कोई तीस बीघे का एक बड़ा टीला है, जिसे लाक्षागिरि कहते हैं. इस समय लाक्षागिरि एक मामूली-सा गांव है. सोमवती अमावस्या के दिन वहां गंगा-स्नान का बड़ा मेला लगता है. इस स्थान का वर्णन महाभारत में आया है. पांडवों का नाश करने के लिए दुर्योधन ने अपने मंत्री पुरोधन के द्वारा एक जाल फैलाया. 
उसने सारे हस्तिनापुर में घोषणा करा दी कि ‘वारणावत’ नगर में एक बड़ा मेला होेने वाला है. इस मेले में जाने के लिए उसने पांडवों और उनकी माता कुंती को भी किसी तरह तैयार करा लिया. अब दुर्योधन ने अपने मंत्री पुरोचन को समझाकर कहा कि पांड़वों के वहां पहुंचने के पहले ही तुम वहां पहुंच जाओ और लाख का घर बनवाओं. पांडवों को होशियारी से उसी घर में ठहराना और मौका मिलने पर जब वे सोते हों तो उसमें आग लगवा देना, जिससे वे जलकर भस्म हो जायं. विदुर को उसका पता चल गया. उन्होंने पांडवों को उसका भेद बता दिया. वारणावत यही जगह थी, जो इस घटना के कारण बाद में लाक्षागृह के नाम से प्रसिद्ध हुई. 

इलाहाबाद के ऐतिहासिक पार्क

मिण्टो पार्क

इलाहाबाद या प्रयागराज के दो पार्कों की भारत की आजादी की लड़ाई में बहुत अविस्म​र​णीय भूमिका है. यहां के मिण्टो पार्क में ही 1857 की क्रांति के बाद 1 नवम्बर 1858 को लॉर्ड कैनिंग ने प्रसिद्ध रानी की घोषणा या विक्टोरिया का घोषणापत्र पढ़ा था जिसके बाद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज खत्म हो गया था. 1910 में भारत के वायसराय लार्ड मिण्टो ने इस पार्क का जीर्णोद्धार करवाया और सफेद पत्थर से एक मेमोरियल का निर्माण करवाया जिस पर चार शेर बने हुए हैं.

अल्फ्रेड पार्क

इलाहाबाद का दूसरा ऐतिहासिक पार्क अल्फ्रेड पार्क है, जहां महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने अपने प्राणों की आहूति दी थी. इसी पार्क में उन्हें अंग्रेज पुलिस ने घेर लिया था लेकिन उन्होंने आत्मसमर्पण करने से इंकार कर दिया और अपना प्राणांत किया. उनकी स्मृति में अब अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर शहीद चंद्रशेखर आजाद पार्क कर दिया गया है.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना 1869 में हुई. दरसअल उत्तर प्रांत के लिए पहले उच्च न्यायालय की स्थापना 1866 में आगरा में की गई थी लेकिन 1869 में इसे इलाहाबाद ले आया गया. 11 मार्च 1919 को इसका नाम इलाहाबाद उच्च न्यायालय हो गया. कुछ समय के लिए अंग्रेज उच्च न्यायालय को अवध ले गए लेकिन आजाद होने के बाद उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय को एक बा​र फिर से इलाहाबाद में स्थापित कर दिया गया. राम मंदिर जन्म भूमि विवाद की सुनवाई इलाहाबाद उच्च न्यायायल में हुई. 
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