देवनारायण जी Bhagwan Devnarayan Story in Hindi

देवनारायण जी की कथा, जीवनी और महिमा

देवनारायण जी गुर्जर जाति के अराध्य और सबके लिए पूज्य है. ऐसी मान्यता है कि वे विष्णु के अवतार थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन जलकल्याण को समर्पित कर दिया. उनके जीवन से प्रेरणा लेकर उनके अनुयायी जन सेवा का काम तत्परता के साथ कर रहे है.

देवनारायण जी का इतिहास

देवनारायण जी का जन्म स्थान

देव नारायण जी का जन्म माघ शुक्ला सप्तमी मालासेरी में हुआ. इनके पिता श्री सवाई भोजन एवं माता का नाम साडू देवी था. देवनारायण जी बगड़ावत वंश के नागवंशीय गुर्जर थे, जिनका मूल स्थान अजमेर के निकट नाग पहाड था.

देवनारायण जी का वंश

अजमेर के चौहान राजाओं द्वारा बगड़ावतों को गोठा की जागीर दी गई. जो वर्तमान में भीलवाड़ा जिले के आसीन्द से अजमेर जिले के मसूदा तक खारी नदी के आसपास का क्षेत्र था. गोठा में बगड़ावतों के साभी भाइयों ने अपने किले बनाए एचं मिल-जुलकर रहने लगे. बगड़ावतों का यश व वीरता की चर्चा मारवाड व मेवाड में होने लगी. बगडावत कुल के पहले प्रतापी राजपुरूष हरिराव थ. हरिराव के पुत्र बाघराव थे. बाघराव के बारह रानियां एवं चौबीस पुत्र थे. इनके पुत्र बाघ रावत कहलाए, कालानान्तर में ये बाघ रावत ही बगडावत कहलाने लगे.

देवनारायण जी के माता—पिता

बाघ रावत के पुत्रों में सवाई भोज बडे प्रतापी थे. सवाई भोज का विवाह उज्जेन के सामन्त दूधा खटाणा की कन्या साढू तथा कोटपूतली के पदम पोसवाल की कन्या पदमा से हुआ था. गोठा इनकी जागीर थी. गढ बुवाल (मारवाड के पास) के सामन्त इडदे सोलंकी की राजकुमारी जयमती सवाई भोज से विवाह करना चाहती थी.

उधर उसके पिता राण के राणा दुर्जनसाल से जयमती का विवाह करना चाहते थे. राणा दुर्जनसाल बारात लेकर जयमती से विवाह करने पहुंच चुके थे, पर सवाई भोज युक्ति से गोठा पहुंच गया.

इस भयंकर अपमान से तिलमिलाकर दुर्जनसाल ने विशाल सेना के साथ गोठा पर आक्रमण कर दिया तथा सभी बगड़ावतों को मार दिया. राणा दुर्जनसाल को युद्ध के बाद भी जयमती प्राप्त नहीं कर पाया. युद्ध में सवाई भोज का साथ देते हुए वह भी वीरगति को प्राप्त हुई.

देवनारायण जी का जन्म

सवाई भोज की दूसरी पत्नी सोढी खटाणी उस समय गर्भवती थी. गुरु रूपनाथ ने सोढी खटाणी को समझाया कि उनका गर्भस्थ शिशु ही वंश का बदला लेगा तथा अन्याय और अत्याचार मिटाएगा.
इस पर सोढी मालासेरी के जंगलों में चली गई. वहीं माध शुक्ला सप्तमी को देव नारायण जी का जन्म हुआ. देवनारायण जी का जन्म का नाम उदयसिंह रखा गया. उनके जन्म का पता राणा दुर्जन को भी लगा. वह बदले की आग में जला जा रहा था. इसलिए उसने सवाई भोज के वंश को ही निर्मूल करने का निश्चय किया. शिशु उदयसिंह को मारने के लिए भी उसने कुछ लोगों को तय कर दिया. अब सोढी खटाणी ने भी मालासेरी में खतरा बढता देखकर अपने पीहर देवास जाने का निर्णय किया.

देवनारायण जी का बचपन

देवनारायण जी का लालन पालन अब देवास में होने लगा. कुछ बडे होते ही वह घुड सवारी और शस्त्र संचालन सीखने लगा. इसी के साथ शिप्रा के किनारे सिद्ध वट नामक स्थान पर वह साधना भी करने लगे. सिद्ध वट के योग्य गुरुओ ने उसे तंत्र विद्या भी सिखाई युवावस्था में पहुंचते देव नारायण जी एक कुशल योद्धा हो गए. जैसे ही उनकी शिक्षा पूरी हुई छोछू उन्हें गोठा ले चलने को लिए देवास आ गए.

देवनारायण जी के चमत्कार

छोछू भाट देव नारायण जी सोढी तथा कुछ अंगरक्षकों के साथ देवास से चल पडा. धार में स्थित महाकाली की आराधना के समय राजा जयसिंह की बीमार पुत्री पीपलदे को अपने से देवनारायण ने भला चंगा कर दिया. वहीं पीपलदे से उनका विवाह हुआ.

देवनारायण जी को विष्णु अवतार माना जाता है. इनका भव्य मंदिर भीलवाडा के आसीन्द में है. देव नारायण जी एक सिद्ध पुरूष थे. अपनी सिद्धियों का उपयोग उन्होंने जन कल्याण में किया. इसलिए वे लोकदेवता बन गए तथा अवतारी पुरूष माने गए.

उनके द्वारा किए गए आश्चर्यजनक कथाओं को जन मानस ने चमत्कार माना और उनके चमत्कारों की कथाएं कही व सुनी जाने लगी. देव नारायण जी के कुछ चमत्कार इस प्रकार है- छोछूं भाट को जीवित करना, पीपलदे की कुरूपता दूर करना, सूखी नदी में पानी बह निकलना, सारंग सेठ को पुनर्जीवित करना.

देवनारायण जी का वैकुण्ठ लोक गमन

31 वर्ष की आयु में अक्षय तृतीया वेसाख शुकल तृतीय सं. 999 को घेडे पर सवार हो बैकुण्ठ धाम चले गए. देवनारायण जी के चमत्कार, पराक्रम व अदभुत कार्यों का चित्रण देवनारायण जी की फड में किया जाता है. भोपाओं द्वारा लोकवाद्य जंतर की संगत पर बडे रोचक एवं आकर्षक ढंग से नृत्य व गायन के सााि फड काा वाचन किया जाता है.

देवनारायण जी की फड़

देव नारायण जी की फड़ भारत की लोक संस्कृति का महान वाहक है. यह गुर्जर भोपाओं द्वारा अपने अराध्य श्री देवनारायण की जी चित्रमय गाथा है जो जिसमें उनके वंशजों से लेकर उनके प्रयाण तक की पूरी कथा रोचक तरीके से प्रस्तुत की जाती है.
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