Essay on India Maldives Relations in Hindi – भारत- मालदीव सम्बंध

भारत और मालदीव के सम्बंध

बीते करीब पांच दशकों में भारत ने मालदीव की आजादी बचाने से लेकर उसके आर्थिक, व्यापारिक और सैन्य उत्थान में लगातार मदद की है। फिर क्यों मालदीव और भारत की दोस्ती के भविष्य पर अंदेशा हो रहा है? मालदीव के चीन की ओर झुकाव के पीछे क्या कारण हैं? इसी बीच मालदीव में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन Abdulla Yameen के इमरजेंसी लगा देने और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस अब्दुल्ला सईद तथा पूर्व राष्ट्रपति मॉमून अब्दुल गयूम Maumoon Abdul Gayoom को कैद कर देने के बाद एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर भारत पर है। दुनिया जानना चाहती है कि ऐसे संकट के घड़ी में क्या भारत मालदीव के मामले में हस्तक्षेप करेगा। इसकी वजह है कि लम्बे अरसे से भारत और मालदीव के बीच महत्त्वपूर्ण सम्बंध रहे हैं। 
मालदीव का सामरिक महत्त्व Strategic Importance of Maldives
श्रीलंका, भारत, चीन और दक्षिण एशियाई देशों के बड़े भू-भाग के लिए के साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र के लिए मालदीव सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मालदीव की सीमा भारतीय केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप Lakshadweep से लगभग 700 किलोमीटर ही है। हिंद महासागर क्षेत्र Indian Ocean Region पर अपनी पकड़ की मजबूती के लिए मालदीव एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। गौरतलब है कि अफ्रीकी देश जिबूती Djibouti में चीन अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा बना चुका है। इससे अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र मे चीन की सामरिक स्थिति काफी मजबूत हुई है। 
भारत के लिए एक बड़ी चिंता की बात यह है कि मालदीव चीन के कर्ज के नीचे दबा होने के कारण चीनी दबाव में है। यही वजह है कि उसका झुकाव चीन की ओर ज्यादा होने लगा है। यह दोनों देशों की आपसी कैमिस्ट्री का ही परिणाम है कि मालदीव में चीनी पर्यटन भी बढ़ने लगा है। वर्ष 2017 में मालदीव में सबसे ज्यादा 3 लाख चीनी पर्यटक आए।
         सामरिक महत्त्व के साथ-साथ भारत के लिए हिंद महासागर क्षेत्र का व्यापारिक महत्त्व भी है। कारण यह कि, भारत का लगभग 95 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय व्यापार हिंद महासागर समुद्री रास्तों से ही होता है।

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भारत और मालदीव के रिश्ते Indo-Maldives Relations

भारत और मालदीव के बीच दशकों से अच्छे सम्बंध रहे हैं। प्राचीन समय से ही मालदीव पर भारतीय हिंदु संस्कृति का अत्यधिक प्रभाव रहा है। मालदीव को ब्रिटिशों से 26 जुलाई 1965 में आजादी मिली थी। भारत मालदीव को एक सम्प्रभु राष्ट्र के रूप में सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में से एक है। चीन ने तो मालदीव में 2011 में अपना दूतावास खोला है जबकि भारत ने वर्ष 1972 में ही मालदीव में अपना दूतावास खोल दिया था।
लम्बे समय तक दोनों देशों के बीच अच्छे सम्बंध रहे हैं। मालदीव और भारत के बीच राजनैतिक सम्बंध के अलावा सामाजिक, धार्मिक और कारोबारी रिश्ता भी रहा है। मालदीव में करीब 25 हजार भारतीय भी निवास करते हैं। भारतीय समुदाय मालदीव में निवास करने वाला दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है।

भारत और मालदीव के द्विपक्षीय सम्बंध India and Maldives: Bilateral Relations 

मालदीव और भारत के बीच अंतरराष्ट्रीय सम्बंध सदैव द्विपक्षीय रहे हैं। अपनी आपसी समुद्री सीमाओं का अधिकारिक निर्धारण दोनों देशों ने 1976 में ही सौहार्दपूर्ण तरीके से कर लिया था। हालांकि 1982 में एक मसला आया जब तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल गय्यूम के भाई ने दावा किया कि भारत के लक्षद्वीप का मिनिकॉय Minicoy द्वीप मालदीव का हिस्सा है। परन्तु मालदीव ने तुरंत ही अधिकारिक रूप से इस दावे को नकार दिया। दोनों देशों ने आपसी व्यापार के लिए भी 1981 में समझौता कर लिया था। दोनों देशों ने  साउथ एशिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट South Asia Free Trade Agreement पर भी हस्ताक्षर कर रखे हैं। दोनों ही देश सार्क South Asian Association for Regional Cooperation (SAARC) और साउथ एशियन इकोनॉमिक यूनियन South Asian Economic Union के संस्थापक सदस्य हैं।

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भारत कई बार मुसीबत के समय मालदीव के काम आया है। दिसम्बर 2014 में भी मालदीव के एकमात्र वाटर ट्रीटमेंट प्लांट कोलाप्स हो जाने के बाद जब माले में पेयजल संकट गहराया तो भारत ने बड़ी मदद की थी। भारत ने पानी की बोतलें लेकर सी-17 ग्लोबमास्टर III और II-76 जैसे अपने दो बड़े लिफ्ट ट्रांस्पोर्टर मालदीव भेजे। नेवी ने भी आईएनएस सुकन्या और आईएनएस दीपक को मालदीव भेज दिया ताकि उनके डीसेलीनेशन प्लांट्स से पीने का पानी उपलब्ध कराया जा सके। 

आपरेशन कैक्टस Operation Cactus 

इंडियन एक्सप्रेस: 4 नवम्बर 1988
आपरेशन कैक्टस के बाद दोनों देशों के सम्बंध और मजबूत हुए
थे। यह मिलिट्री आपरेशन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मालदीव की मदद के लिए 3 नवम्बर 1988 को लॉन्च किया था। उस वक्त पीपल्स लिबरेशन आर्गेनाइजेशन आफ तमिल ईलम People’s Liberation Organisation of Tamil Eelam (PLOTE) के करीब 80 ​हथियारबंद आतंकियों ने मालदीव पहुंचकर माले एयरपोर्ट को अपने कब्जे में कर लिया था। उनकी कोशिश सत्ता हथियाने की थी। मालदीव सरकार के आग्रह पर आपरेशन कैक्टस के तहत भारतीय सेना बल 12 घंटों में ही मालदीव पहुंच गया और कुछ ही घंटों में आतंकियों को कुचल दिया गया। इस मिशन में 19 आतंकी मारे गए और एक भारतीय जवान जख्मी हुआ।

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भारत के इस कदम को संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ, ग्रेट ब्रिटेन सहित नेपाल और बांग्लादेश का भी सम​र्थन मिला। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति Ronald Reagan ने भारत के इस कदम को क्षेत्रीय शान्ति के लिए एक महत्त्वपूर्ण योगदान बताया था। यूनाइटेड किंगडम की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर Margaret Thatcher ने भी आपरेशन कैक्टस के लिए भारत का शुक्रिया अदा करते हुए कहा था कि इतने कम समय में मालदीव की मदद के लिए सेना नहीं भेजी जा सकती थी। इस मिशन के बाद दोनों देश काफी करीब आ गए थे। श्रीलंका के साथ अपने तनावपूर्ण रिश्तों के मद्देनजर मालदीव अपनी सुरक्षा के लिहाज से भारत के साथ दोस्ती को काफी तरजीह दी।

भारत और मालदीव के व्यापारिक रिश्ते Trade Relations of Indian and Maldives

आपरेशन कैक्टस की सफलता के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते भी मजबूत हुए। भारत ने मालदीव को काफी आर्थिक सहायता मुहैया करवाई। साथ ही आधारभूत संरचना के विकास, नागरिक उड्यन, स्वास्थ्य, दूरसंचार और अन्य क्षेत्रों में कई द्विपक्षीय समझौते अमल में लाए। राजधानी माले में इंदिरा गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल भी खोला गया। मालदीव के छात्रों के लिए स्कॉलरशिप प्रोग्राम चलाया गया। स्टेट बैंक आफ इंडिया ने भी मालदीव को अपनी ​आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के लिए 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता दी थी।

मालदीव और भारत के सैन्य सम्बंध Indo-Maldives Military Relations 

 

आईएनएस त्रिंकट
वर्तमान में भले ही मालदीव भारत और चीन के बीच अपने सम्बंधों को लेकर नीति स्पष्ट नहीं कर रहा हो, परन्तु शुरू से ही भारत मालदीव का हितैषी रहा है। अप्रैल 2006 में भारत ने मालदीव को त्रिंकट Trinkat श्रेणी का फास्ट अटैक क्राफ्ट मालदीव नेशनल डिफेन्स फोर्स के कोस्ट गार्ड के लिए तोहफे में दिया था। भारत की मदद से मालदीव अपने सभी 26 द्वीपों पर तटीय रडार भी विकसित कर रहा है। जबकि पहले मालदीव के पास केवल दो द्वीपों पर ही रडार थे। वर्ष 2009 से भारत और मालदीव हर साल एकुवेरिन Ekuverin नाम से संयुक्त युद्वाभ्यास भी कर रहे हैं। इसका मकसद काउंटरर-टैरेरिज्म के लिए अपनी क्षमताओं का विकास करना है।

मालदीव विवाद की पृष्ठभूमि Background of Maldives Crisis

फरवरी 2018 में मालदीव में एक बार फिर सियासी संकट आ खड़ा हुआ। मालदीव के इस संकट को समझने के लिए हमें एक दशक पीछे जाना पड़ेगा। मालदीव में लोकतांत्रिक तरीके से पहली बार 2008 में मोहम्मद नशीद राष्ट्रपति चु​ने गए थे।
मोहम्मद नशीद ने उस वक्त तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल गयूम को चुनावों में हराया था। सन 2012 में मोहम्मद नशीद ने एक जस्टिस को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में डलवा दिया। इसके बाद मोहम्मद नशीद को राष्ट्रपति पद से अपदस्थ कर दिया गया। फिर 2013 में हुए चुनावों में अब्दुल्ला यामीन ने मोहम्मद नशीद को हराया और राष्ट्रपति बन सत्ता पर काबिज हुए। परन्तु इन चुनावों के परिणामों पर विवाद हो गया। इसके बाद 2015 में आतंकवाद के आरोप में मोहम्मद नशीद को 13 वर्ष की सजा सुना दी गई। तब से मोहम्मद नशीद मालदीव से निर्वासित हैं।

मालदीव का वर्तमान संकट What is Crisis of Maldives

मालदीव विवाद में 1 फरवरी 2018 को एक नया मोड़ आया। मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोहम्मद नशीद के खिलाफ जो सुनवाई चली थी, वह असंवैधानिक थी। इस निर्णय के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अन्य राजनैतिक कैदियों को रिहा करने का आदेश भी दे दिया। इसके साथ ही मालदीव के 12 सांसदों के निलम्बन को निरस्त कर उनकी सदस्यता बहाल कर दी। इन सांसदों की सदस्यता बहाल होने से विपक्षी पार्टी का संख्या बल बढ़ रहा था, सो राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने संसद को 3 फरवरी को स्थगित ही कर दिया। और वो भी अनिश्चितकाल के लिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को मानने से मना कर दिया गया। एक और कदम आगे बढ़ाकर संसद पर सेना लगा दी ताकि संसद में ये सांसद प्रवेश ही नहीं कर सकें।
इसी बीच मालदीव में पुलिस और दूसरी संस्थाओं  की ओर से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनुपालना की मांग उठी मगर यह मांग करने वाले लोगों को या तो बर्खास्त कर दिया गया या फिर उनका इस्तीफा ले लिया गया। साथ ही अटॉर्नी जनरल ने घोषणा कर दी कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला महत्त्वपूर्ण नहीं बल्कि संविधान महत्त्वपूर्ण है। अंतत: 5 फरवरी 2018 को राष्ट्रपति ने मालदीव में आपातकाल की घोषणा कर दी और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तथा पूर्व उपराष्ट्रपति  अब्दुल गय्यूम को गिरफ्तार कर लिया गया।

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भारत की भूमिका Role of India in Maldives Crisis

विश्व के देशों का एक बड़ा समुदाय मालदीव संकट पर भारत की ओर देख रहा था। निर्वासित जीवन बिता रहे मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भी भारत के हस्तक्षेप की मांग की। पिछले कुछ वर्षों पर नजर डालें तो पता चलता है कि भारत फिलहाल मालदीव के साथ सम्बंधों में उत्साहजनक रूचि नहीं दिखा रहा है।  कूटनीतिज्ञों की नजर में भारत का यह स्टैंड सोचा-समझा माना जा रहा है। इसके कारणों में शायद एक कारण यह भी है कि मालदीव ने राष्ट्रमंडल की सदस्यता भी त्याग दी है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों के नजरिए से देखा जाए तो भारत की उपेक्षा का एक और कारण नजर आता है। और वह है मालदीव का चीन की ओर झुकाव। इसके पीछे हिंद महासागर क्षेत्र में प्रभुत्व की लालसा नजर आती है।

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मालदीव अगर भारत का समर्थन और हस्तक्षेप चाहता है तो उसे
अपनी आंतरिक व्यवस्था के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों को लेकर भी दोस्ताना संकेत देने होंगे। हालांकि अमेरिका और यूरोपियन यूनियन की तरह भारत भी चाहता है कि मालदीव में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना की जाए। मालदीव की अर्थव्यवस्था में सबसे महत्त्वपूर्ण घटक यहां का पर्यटन है।  

मोदी की मालदीव यात्रा

भारत मालदीव संबंधों में पुनः गर्मजोशी बहाल होने की उम्मीद सितम्बर 2018 में जगी, जब भारत समर्थक माने जाने वाले इब्राहीम मोहम्मद सोलिह ने चीन समर्थक अब्दुल्ला यमीन को राष्ट्रपति चुनाव में हराया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी नवम्बर में मालदीव के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति इब्राहीम मोहम्मद सोलिह के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने पहुंचे।  प्रधानमंत्री के तौर पर  मोदी का यह पहला मालदीव दौरा था। तीन साल पहले भी प्रधानमंत्री मोदी की एक मालदीव यात्रा रद्द कर दी गई थी।  इससे पहले 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मालदीव की यात्रा पर गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  मालदीव को एक अरब 40 करोड़ डालर की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की है. 

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