सिकन्दर और पोरस की कहानी

सिकन्दर और पोरस की कहानी sikander and porus history in hindi

विश्व विजेता सिकंदर के बारे में कौन नहीं जानता, रोम का सम्राट जो पूरी दुनिया जीतने चला और भारत आकर उसे योद्धाओं की फौज का ऐसा सामना करना पड़ा कि वह वापस लौट गया. भारत में पोरस से लड़ाई करने के बाद उसे पता चला की इस धरती पर कैसे-कैसे वीर रहते हैं. सिकन्दर और पोरस की कहानी जानने से पहले हमे सिकंदर की जीवनी को जानना चाहिए कि आखिर में एक सामान्य लड़का एक विश्व विजेता में कैसे तब्दील हो गया.

सिकंदर की जीवनी king sikandar story in hindi

सिकंदर का जन्म प्राचीन रोम के इफेसस में हुआ था. उनके पिता राजा फिलिप उस वक्त मेसिडोनिया, रोम के महान शासको में से एक थे. कहते हैं कि जब सिकन्दर का जन्म हुआ उस वक्त इफेसस में मौजूद डायना के मंदिर में आग लग गई और भविष्यवक्ताओं ने दावा किया कि एक ऐसी ताकत का जन्म हुआ है जो पूरे एशिया पर अपना परचम लहराएगा.

सिकंदर बचपन से बहुत मेधावी था और मेहनत करना उसे बहुत पसंद था. उसे हमेशा सर्वश्रेष्ठ पाने की चिंता लगी रहती थी. वह हमेशा कुछ सीखने की कोशिश करता रहता था और आराम से बैठना तो उसकी फितरत में ही नहीं था.

अपनी प्रतिभा के बल पर जल्दी ही सिकन्दर पूरे रोम में मशहूर हो गया और लोग मानने लगे कि योग्यता के मामले में वह अपने पिता फिलिप से दो कदम आगे ही है. सिकंदर को अपने पिता से भी बहुत कुछ सीखने को मिला और युवा सिकंदर दुनिया जीतने को तैयार था.

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सिकंदर का घोड़ा बुसिफेलस

सिकंदर के साथ ही उसका स्वामीभक्त घोड़ा बुसिफेलस भी बहुत मशहूर था. वह भी अपने स्वामी की तरह ही तेज-तर्रार और बहादुर था. सिकंदर और बुसिफेलस के मिलने की कहानी भी कम रोचक नहीं है.

एक व्यापारी पहली बार जब बुसिफेलस को लेकर राजा फिलिप के पास पहुंचा तो उसकी कद-काठी देखकर सभी आश्चर्य में पड़ गए लेकिन बुसिफेलस ने किसी भी योद्धा को अपने आप पर सवार नहीं होने दिया. व्यापारी निराश होकर वापस लौटने लगा तो सिकन्दर ने घोड़े को नियंत्रित करने की अपनी इच्छा पिता फिलिप को बताई.

पिता फिलिप युवा सिकन्दर पर नाराज भी हुए क्योंकि उनकी कहना था कि जब इतने अनुभवी योद्धा बुसिफेलस की सवारी नहीं कर सके तो एक युवा इसको कैसे नियंत्रित कर सकेगा.

आखिर में इस शर्त के साथ सिकंदर को अनुमति मिली कि अगर वह घोड़े को नियंत्रित कर लेगा तो उसका मालिक बन जाएगा और यदि कहीं वह इस काम में असफल होता है तो उसे इस घोड़े की कीमत चुकानी होगी और उसे घोड़ा भी नहीं मिलेगा.

सिकन्दर यह पहले जान चुका था कि बुसीफेलस अपनी ही परछाई से डर रहा है तो उसने उस तरफ से बुसीफेलस पर बैठने की कोशिश की जिस तरफ से घोड़े को रोशनी मिल रही थी ऐसे में घोड़े को परछाई दिखनी बंद हो गई और कुशाग्र सिकन्दर बुसिफेलस पर सवार हो गया और पूरी जिंदगी के लिए उसे स्वामी भक्त घोड़ा मिल गया.

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सिकन्दर और अरस्तु

अपने प्रतिभाशाली बेटे से राजा फिलिप बहुत प्रभावित थे और वे चाहते थे उसे राज-काज की शिक्षा किसी बहुत योग्य शिक्षक के हाथों से मिले. उन दिनों पूरे रोम में अरस्तु के दर्शन और उनकी शिक्षा का प्रभाव था. अरस्तु महान दार्शनिक प्लेटो के शिष्य थे और रोम में उन्हें प्लेटो के समान ही इज्जत दी जाती थी.
राजा फिलिप ने अपने बेटे को शिक्षित करने के लिए अरस्तु को चुना और विधि पूर्वक अरस्तु को सिकन्दर का गुरू बना दिया गया. अरस्तु जितने अच्छे शिक्षक साबित हुआ, सिकन्दर उससे कहीं बेहतर शिष्य साबित हुआ.
सिकन्दर के जीवन पर होमर के इलियड का भी बहुत प्रभाव था और ट्राय की युद्धगाथा उसे जबानी याद थी. अपने युद्ध अभियानों के दौरान वह इलियड की एक प्रति जिस पर अरस्तु की टिप्पणियां लिखी हुई थी अपने साथ रखता.

16 साल का सिकन्दर सम्राट

अपने बेटे की प्रतिभा के साथ न्याय करने के लिए राजा फिलिप ने सिर्फ 16 साल की उम्र में सिकन्दर को मेसिडोनिया का राजा बना दिया. सिकन्दर की कम उम्र को देखते हुए कई लोगों ने यह सोच कर विद्रोह कर दिया कि कम उम्र का राजा राज्य संभाल नहीं पायेगा और उसे अपदस्थ करना आसान होगा. सिकन्दर ने सभी विद्रोहों को बहादुरी से कुचल दिया.

सिकन्दर की मां ओलिमपियास

सिकन्दर की मां ओलिमपियास और उसके पिता फिलिप के बीच सम्बन्ध ज्यादा अच्छे नहीं थे. कहा जाता है कि एक बार फिलिप ने अपनी रानी को एक सांप के साथ देख लिया था और तभी से उसने ओलिमपियास के नजदीक जाना छोड़ दिया और दूसरी शादी कर ली.
इस बार से ओलिमपियास बहुत नाराज हो गई और उसके क्रोध तथा ईष्र्या के कारण फिलिप को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा. पूरे मेसिडोनिया में यह बात आम हो गई थी कि उनके राजा और रानी के बीच संबंध अच्छे नहीं है. ओलिमपियास की नफरत से सिकंदर भी प्रभावित हुआ और वह अपने पिता से दूर रहने लगा था.
सिकन्दर के पिता ने क्लियोपेत्रा से शादी की तब तो उसने अपने पिता के साथ सभी संबंध तोड़ दिए और मेसिडोनिया छोड़ के चला गया. कुछ समय बाद फिलिप की हत्या हो गई और सिकन्दर एक बार फिर मेसिडोनिया लौट आया. जब पिता फिलिप की मृत्यु हुई तो सिकन्दर सिर्फ 20 साल का था.

सिकन्दर की विश्व विजय Sikandar Poras next episode

सिकन्दर ने राजा बनते ही सबसे पहले यूनान की तरफ ध्यान केन्द्रित किया जिसको जीतने में फिलिप नाकाम रहा था और उसने बहुत बहादुरी से युनान के प्रभाव को पहले तो कम किया और जल्दी ही यूनान तथा एथेंस दोनो ने उसकी अधिनता स्वीकार कर ली.
इसके बाद सिकन्दर ने ईरान का रूख किया और माइनर एशिया की सभी लड़ाइयों में रोम की विजय पताका फहरा दी. ईरान के राजा डेरियस की 6 लाख की विशाल फौज को सिकन्दर ने बहुत आसानी से हरा दिया. ईरान विजय ने उसके लिए दक्षिण एशिया का दरवाजा खोल दिया और भारत जैसा विशाल देश उसके साम्राज्य का हिस्सा बनने की ओर था.
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सिकन्दर और पोरस की लड़ाई sikandar aur porus ka yudh

poras kon tha in hindi एशिया माइनर और ईरान की जीत से सिकंदर को इतना धन मिला कि उसके सैनिकों के लिए इस धन के साथ चलना मुश्किल हो गया लेकिन सिकन्दर भारत जीतने के अपने सपने को  हर हाल में पूरा करना चाहता था और इसी धुन में उसने सोने और माल से लदी गाड़ियों में आग लगा दी ताकि सैनिकों की चाल तेज हो सके.
तक्षशिला उस समय भारत के लिए प्रवेश द्वार माना जाता था. तक्षशिला के राजा ने सिकन्दर की बहादुरी के बारे में सुन रखा था इसलिए उसने लड़ने के बजाय दोस्ती का प्रस्ताव भेजा जिसे सिकंदर ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और तक्षशिला सिकन्दर की अधीनता में आ गया.
porus ka itihas इसके बाद सिकन्दर आगे बढ़ा तो उसे पता चला कि आगे एक पराक्रमी राजा पोरस का राज्य है. तक्षशिला के अनुभव से सिकन्दर को लगा कि पोरस भी लड़ने की हिम्मत नहीं करेगा लेकिन उसका ये अनुमान गलत निकला.
राजा पोरस ने सिकन्दर को लड़ने के लिए आमंत्रित किया और हाइडेस्पीस नदी के किनारे दोनों की सेनाएं आ खड़ी हुईं. पोरस की विशाल सेना को देखकर सिकन्दर के सिपाहियों का आत्मबल कमजोर हो गया लेकिन सिकन्दर बहादुर होने के साथ ही एक कुशाग्र सेनापति भी था.
उसने जानबूझ कर नदी के किनारे को लड़ाई के मैदान के तौर पर चुना था क्योंकि उसे मालूम चल गया था कि पोरस की सेना में ज्यादातर हाथी हैं और यह बरसात का मौसम था. बरसात हो जाने की हालत में नदी किनारे की जमीन दलदली हो जाएगी और पोरस के हाथी बेकार हो जाएंगे.
सिकन्दर ने अपने सिपाहियों का हौंसला बढ़ाया और रात का इंतजार करने को कहा क्योंकि आसमान काले बादलों से भर चुका था. पोरस ने आगे बढ़कर सिकन्दर पर आक्रमण करने की कोई कोशिश नहीं की जो उसके लिए एक ऐतिहासिक गलती साबित हुई. रात को खूब बारिश हुई और जमीन कीचड़ से भर गया.
आधी रात के बाद सिकन्दर ने पोरस की सेना पर हमला कर दिया. पोरस बहादुरी से लड़ा लेकिन हाथी बेकार होने की वजह से जल्दी ही सिकन्दर के सिपाहियों ने उसे घेरकर गिरफ्तार कर लिया और युद्ध समाप्त हो गया. अगले दिन जब सिकन्दर के सामने पोरस को लाया गया तो नाराज सिकन्दर ने पोरस से पूछा कि उसके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए.
तब पोरस ने अपना इतिहास प्रसिद्ध जवाब दिया कि जैसा कि एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिए. सिकन्दर अपनी तमाम विजयों में अपनी दयालूता और सदाशयता के लिए पहले ही पहचान बना चुका था. अरस्तु के निर्देशन में वह सिर्फ योद्धा ही नहीं बल्कि एक दार्शनिक भी बन चुका था.
पोरस के इस जवाब से प्रसन्न होकर उसने पोरस को  उसका न सिर्फ साम्राज्य लौटाया बल्कि उसे नये राज्यों की कमान सौंप दी. पोरस ने भी उसकी मित्रता की लाज रखी और आखिर तक वह सिकन्दर के लिए काम करता रहा.
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सिकन्दर और पोरस की लड़ाई के परिणाम raja porus history in hindi

हालांकि सिकन्दर पोरस की लड़ाई में पोरस हार गया था लेकिन उसने युद्ध में इतनी बहादुरी दिखाई कि रोमनों की आगे बढ़ने की हिम्मत ही टूट गई. सिकन्दर की सेना को भारी नुकसान हुआ और इस जीत ने उसकी सेना की कमर तोड़ दी. इसी लड़ाई में उसका प्यारा घोड़ा बूसिफेलस भी मारा गया.
अपने प्रिय घोड़े की मौत से सिकन्दर बहुत दुखी हुआ और उसकी याद में उसने इसी जगह एक शहर बुसिफालिया बसाया. 326 ईसा पूर्व हुए इस युद्ध से सिकन्दर को समझ में आ गया था कि भारत को जीतना बहुत मुश्किल है.
हिंद महासागर तक पहुंचने के बाद उसने वापस लौटने का फैसला लिया और sikandar ki mrityu विश्व विजेता सिकन्दर घर की और लौट गया जहां बेबीलोन में 10 जून, 323 ईसा पूर्व उसकी मृत्यु हो गई.
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