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बच्चे की साइकोलॉजी समझने के 10 टिप्स

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बच्चे की साइकोलाॅजी समझना पेरेंट्स की जिम्मेदारी

बच्चे की साइकोलॉजी समझना माता—पिता के लिये हमेशा ही मुश्किल का काम रहा है. बच्चों का मनोविज्ञान समझने में बहुत बारीक अन्वेषण की जरूरत है. विख्यात मनोवैज्ञानिक Psychologist सिगमंड फ्राॅयड Sigmund Freud ने कहा कि है कि बच्चे प्रारम्भ में स्वाभाविक इच्छाओं से प्रभावित होते हैं, मगर धीरे-धीरे अपने माता-पिता के मूल्यों और आदतों के अनुसार वास्तविक दृष्टिकोण को अपनाने लगते हैं. 

एक मां या पिता होने के नाते अपने बच्चे के मनोविज्ञान, मतलब उसकी साइकोलाॅजी Psychology को समझना आपके लिए सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है. हर पेरेन्ट्स साइकोलाॅजिस्ट नहीं हो सकते मगर अपने बच्चे की साइकोलाॅजी Psychology of Kids को समझना भी पेरेन्ट्स की ही जिम्मेदारी है.

हालांकि इसके लिए आपको मनोविज्ञान की मोटी-मोटी किताबें पढ़ने की जरूरत नहीं मगर आपके बच्चे की छोटी-छोटी आदतों और हरकतों का आब्जर्वेशन Observation और विश्लेषण Analysis कर आप बच्चे की साइकोलॉजी को जान सकते हैं. इसका फायदा यह होगा कि आप अपने बच्चे में कोई मनोविकार Psychological Disorder पैदा होने से पहले ही उसे भांप सकते हैं और उसके बुरा रूप लेने से पहले उसे रोक सकते हैं.

आपके बच्चे को क्या पसंद है क्या नहीं, वह किन बातों पर खुश होता है किन बातों पर नाराज होता है, ऐसी ही साधारण बातें आपको आपके बच्चे की मनोदशा के बारे में बताएंगी.

जाने माने मनोविज्ञानियों, विश्लेषकों और रिसर्च के निष्कर्ष के आधार पर हिंदीहाट आपको 10 साधारण टिप्स के माध्यम से बता रहा है कि कैसे आप अपने बच्चे की साइकोलॉजी को समझकर उसके बचपन में ही उसके जीवन को सही दिशा की ओर मोड़ सकते हैं.

1. निगरानी रखें, आब्जर्व करें Keep an Eye and Observe

 

आब्जर्वेशन Observation ही अपने बच्चे की साइकोलाॅजी को जानने का सबसे साधारण और बेहतर तरीका है. बच्चा जो करता है और कहता है उसमें रूचि दिखाएं. जब आपका बच्चा खाता है, सोता है और खेलता है तब उसके मूड और उसकी अभिव्यक्तियों Expressions को आब्जर्व करें.

ध्यान रखें कि आपका बच्चा यूनिक Unique है और उसका भी एक व्यक्तित्व है, एक डिग्निटी है. इसलिए अपने एक बच्चे की अपने दूसरे बच्चे से कभी कोई तुलना नहीं करें. इससे उसमें तनाव के साथ-साथ हीनभावना पैदा होगी. आप अपने आप से प्रश्न करें कि आपका बच्चा सबसे ज्यादा क्या करना पसंद करता है?

जब उसे कोई सब्जी खाने की, जल्दी सोने की या होमवर्क करने की इच्छा नहीं होती तो वह कैसे रिएक्ट करता है? वह दूसरे बच्चों और लोगों में कितना घुलता-मिलता है और इसमें कितना वक्त लेता है? क्या वह नहीं चीजें पसंद करता है?

2. ध्यान दें, ध्यान बांटे नहीं – Pay Attention

बच्चों को दी जाने वाली अटेंशन को आप किसी और काम से बांटें नहीं. जब आप बच्चे पर ध्यान देते हुए कोई दूसरा काम करते हैं तो बच्चे के भीतर से उसे समझने का अवसर खो देते हैं.

दिन में कम से कम एक एक्टिविटी ऐसी प्लान करें जिसमें आप पूरा समय अपने बच्चे को ही दें. ऐसा करने से बच्चे को लगता है कि वह समय सिर्फ उसका है और वह आपसे और अधिक खुलने लगता है. 

3. बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं – Spend Quality Time

आजकल की व्यस्त लाइफ स्टाइल में पेरेंट्स कई चीजें एक साथ करते हैं और इन कई चीजों में उनका बच्चा भी शामिल होता है. अगर आप अपने बच्चों को समझना चाहते हैं तो आपको उनके लिए समय निकालना ही पड़ेगा. आप कितने भी व्यस्त हों मगर बच्चों को समय देने का कोई विकल्प नहीं है.

खाने के समय उनके साथ बैठना तथा स्कूल छोड़ने और स्कूल से लाने के लिए दिया गया समय कतई पर्याप्त नहीं है. आपको उनके साथ खेलना भी होगा और उनके साथ बात भी करनी होगी ताकि आप उन्हें अच्चे से समझ सकें. उनके साथ बात करने से आप जान पाएंगे कि उनके स्कूल में क्या चल रहा है और उनके जीवन में क्या चल रहा है.

बच्चे की साइकोलॉजी समझने के लिए आपको उनसे पूछना होगा कि उनका फेवरेट टीवी शो कौनसा है? उन्हें क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं. केवल बात करना ही काफी नहीं. जब आपके बच्चे कुछ कर रहे हों तो आप उनके पास चुप-चाप बैठकर उन्हें आब्जर्व करें और उनके मन के भीतर जो चल रहा है उसे बाहर निकाल कर उनके व्यक्तित्व को समझने की कोशिश करें.

4. दोष नहीं दें, कारण ढूंढें – Find Reasons

बहुत सारी मनोवैज्ञानिक रिसर्च से यह साबित हुआ है कि बच्चे का व्यवहार और बर्ताव उसके आस-पास के वातावरण के अनुसार ही विकसित होता है. बच्चे को समझने के लिए सबसे पहले उसके आस-पास के वातावरण को समझें.

रिसर्च यह भी बताती हैं कि घर के साथ-साथ पास-पड़ौस का वातावरण बच्चे के दिमाग के विकास और उसकी भाषा Language तथा ज्ञान सम्बंधी Cognitive स्किल पर भी प्रभाव डालता है. बच्चे के सम्पर्क में आने वाले लोग उससे कैसा बर्ताव करते हैं, यह बच्चे की साइकोलॉजी को प्रभावित करता है.

अगर आपका बच्चा आक्रामक Aggressive होने लगा है और उसने लोगों से घुलना-मिलना कम कर दिया है तो आपको उसके आस-पास के वातावरण तथा घर एवं स्कूल के वातावरण का विश्लेषण करना चाहिए और जानना चाहिए कि कौन उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर रहा है. नाकि अपने बच्चे को दोष देना चाहिए.

5. बच्चे के दिमाग का फंक्शन समझें – Understand Brain Functioning

प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक चाइल्ड साइकोलाॅजिस्ट डेनियल जे. सीगल Daniel J. Seagal के अनुसार बच्चे के दिमाग की फंक्शनिंग Brain Functioning को समझ कर आप अपने बच्चे के एक स्वस्थ सोशल और इमोशनल जीवन Healthy Social and Emotional Life की नींव रख सकते हैं.

पेरेंट्स अक्सर अपने बच्चे की साइकोलॉजी तो समझ जाते हैं मगर यह नहीं जानते कि उनके बच्चे का दिमाग कैसे काम फंक्शन कर रहा है. बच्चे का दिमाग, बचपन से लेकर अब तक उसके अनुभवों के अनुसार आकार लेता है और इसी के आधार पर वह विभिन्न परिस्थितियों में अपनी प्रतिक्रिया देता है.

किसी कारण से बच्चे के अनुभव बुरे रहे हैं तो इसका परिणाम होगा कि बच्चा उन अनुभवों से सम्बंधित बातों पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देने लगता है. इससे के लिए बच्चे को अच्छे और सकारात्मक अनुभवों एवं अवसरों से गुजारना होगा अन्यथा उसके ओवरआॅल डवलपमेंट पर बुरा असर पड़ने लगेगा.

6. बच्चे से उसकी कहानी सुनें – Listen Their Story

बच्चों से बात करना आसान होता है मगर उसकी बातें सुनना और समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है. बच्चे की साइकोलाॅजी समझने के लिए पहले उससे बात करना शुरू करें और फिर उसे सुनकर समझने की कोशिश करें. ध्यान रखें कि बच्चे अपनी बात स्पष्ट रूप से नहीं कह सकते मगर आप उनके शब्दों को सुनकर उनके शब्दों में छिपी भावनाओं को पहचानने का प्रयास करें.

आप फोकस करें कि आपका बच्चा किसी शब्द पर किस प्रकार जोर देता है. यह समझने की कोशश करें कि बच्चा किसी शब्द को किन भावनाओं के साथ कहना चाह रहा है. या फिर किसी शब्द या वाक्य या घटना को बोलते समय घबरा तो नहीं रहा. बच्चे के बोलते समय बाॅडी लैंग्वेज Body Language और आई काॅन्टैक्ट Eye Contact पर ध्यान दें.

यह भी ध्यान दें कि बोलते वक्त वह अपने हाथों को कैसे काम में लेता है और उसका बाॅडी पोस्चर Body Posture क्या है. इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि आप जो बात बच्चे से बोलते हैं उसमें से वह कौनसी बात गौर से सुनता है और रिएक्ट करता है. बच्चे से प्रश्न भी पूछें मगर ध्यान रखें कि कोई सवाल इतना ज्यादा या इतनी इटेंसिटी से नहीं पूछें कि वह जवाब देने से कतराने लगे.

7. बच्चों की अभिव्यक्ति को समझें – Read the Expressions

बच्चे किसी भी बात को बड़ों की भांति कई प्रकार से अभिव्यक्त करते हैं मगर बच्चों की अभिव्यक्ति के दूसरे तरीकों पर बड़े अक्सर गौर नहीं करते. अगर आपके बच्चे कुछ ड्राॅ करना, लिखना या एक्टिंग करना पसंद करते हैं तो उन्हें मोटिवेट करें और प्रोत्साहित करें. उनकी कल्पना में बाधा नहीं बनें और उन्हें ड्राइंग क्लास या एक्टिविटी क्लास जाॅइन कराएं.

घर पर आप उन्हें उनके आर्टवर्क को मेंटेन करने, सहेजने के लिए कहें और उन्हें उनकी कल्पना को अभिव्यक्त करने के लिए अलग-अलग टाॅपिक दें. आपका बच्चा जितना लिखेगा या ड्राॅ करेगा, वह उतना ही एक्स्प्रेसिव बनेगा.

उनके आर्टवर्क को समय निकालकर देखें और उन्हें सुझाव दें मगर इस बात का पूरा ध्यान रखें कि आपके सुझाव उसकी कल्पना में अपनी कल्पना या विचार को घुसाने का प्रयास नहीं करें. उनके विचार और कल्पना को मूल ही रहने दें. 

8. सही सवाल करें – Launch Right Question

आप चाहते हैं कि आपका बच्चा आपसे खुल कर बात करे तो अपने बच्चे को सही सवाल पूछें. बच्चों से बातचीत लम्बी और पूरी हो इसके लिए आप उनसे ऐसे सवाल करें जिनके जवाब वे सहजता और आसानी से दे सकें. ध्यान रखें कि बातचीत जितनी सहज होगी उतनी ही लम्बी और सार्थक होगी.

सवाल ऐसे हों कि आप उनसे सही उत्तर ले सकें. उदाहरण के लिए, अगर आप बच्चे से यह पूछेंगे कि अमुक गाना उसको अच्छा लगता है या नहीं, तो उसका जवाब हां या ना में होगा. बेहतर है कि आप उससे पूछें कि अमुक गाना अच्छा क्यों लगता है?

इस सवाल के बारे में बच्चा ज्यादा बोलेगा और उसका जवाब उसकी विश्लेषण शक्ति को भी बढ़ाएगा. इसी तरह, कौनसा खेल पसंद है, इसके स्थान पर पूछें कि वह अपना पसंदीदा खेल कैसे खेलता है? बच्चों के सवालों का जवाब भी तर्कसंगत दें, उनके सवालों को टालना उनकी जिज्ञासा को नष्ट कर देगा.

9. बच्चा बनकर सोंचें – Be Child to Understand the Child

बच्चों को पहचानने के लिए कई बार बच्चा बनकर उनकी तरह सोचना जरूरी है. बच्चे को बेहतर रूप में समझने के लिए बच्चों से हमदर्दी और समानुभूति भी जरूरी है. इसके लिए उनकी भावनाओं को समझें और जानने की कोशिश करें कि उनके मन में क्या चल रहा है.

उनकी भाषा में बात करें, सोचें कि अगर इस परिस्थिति में आप बच्चे होते तो अपने पेरेंट्स से किस तरह बात करने की उम्मीद करते. मन में यह बहम कभी नहीं पालें कि वह बच्चे हैं और कुछ नहीं समझते.

10. बच्चे का EQ समझें – Know Emotional quotient of Kids

कई बार बच्चों की फीलिंग और इमोशंस Feelings and Emotions को हल्के में ले लिया जाता है. यह मान लिया जाता है कि वे बड़े होकर सब भूल जाएंगे. साइकोलाॅजिकलल रिसर्च के अनुसार यह गलत है. बच्चा जिन बातों का बचपन में सामना करता है वह बातें जब वह बड़ा होता है, तब उसके जीवन पर गहरी असरकारक होती हैं.

इमोशनल इंटेलीजेंस Emotional Intelligence और इमोशनल कोशंट Emotional Quotient एक व्यक्ति की अभिव्यक्ति की और उसकी भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता होते हैं. हर बच्चा यूनिक होता है फिर वह चाहे ज्यादा बोलने वाला हो सकता है या फिर शर्मीला हो सकता है.

एक पेरेंट होने के नाते यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप अपने बच्चे के EQ को समझें और उसे एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में तैयार करें जो मानसिक रूप से पूरी तरह हैल्दी हो, इमोशनल हो और इंटेलीजेंट हो.

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